शाम Poetry (page 11)

जब मैं रोया हूँ वो रोए हैं ये उल्फ़त मेरे साथ

सय्यद काज़िम अली शौकत बिलगिरामी

बाँहों में यार हो, कोई फ़ुर्सत की शाम हो

सय्यद काशिफ़ रज़ा

तौर अपना है अलग ईं से अलग आँ से अलग

सय्यद जमील मदनी

तर्क-ए-उल्फ़त से मोहब्बत का लिखा मिट न सका

सय्यद बासित हुसैन माहिर लखनवी

ज़ीस्त में कोशिश-ए-नाकाम से पहले पहले

सय्यद आरिफ़ अली

ये कैसे ख़ौफ़ हमें आज फिर सताने लगे

सय्यद अनवार अहमद

हल्क़ा-ए-शाम-ओ-सहर से नहीं जाने वाला

सय्यद अमीन अशरफ़

हल्क़ा-ए-शाम-ओ-सहर से नहीं जाने वाला

सय्यद अमीन अशरफ़

बे-जुर्म-ओ-बेगुनाह ग़रीब-उल-वतन किया

सय्यद अाग़ा अली महर

यही था वक़्फ़ तिरी महफ़िल-ए-तरब के लिए

सय्यद आबिद अली आबिद

दिन ढला शाम हुई फूल कहीं लहराए

सय्यद आबिद अली आबिद

ये धूप गिरी है जो मिरे लॉन में आ कर

स्वप्निल तिवारी

सूने सूने से फ़लक पर इक घटा बनती हुई

स्वप्निल तिवारी

मुँह अँधेरे तेरी यादों से निकलना है मुझे

स्वप्निल तिवारी

अपने ख़्वाबों को इक दिन सजाते हुए

स्वप्निल तिवारी

हर क़दम साँपों की आहट और मैं

सालेह नदीम

तू उरूस-ए-शाम-ए-ख़याल भी तू जमाल-ए-रू-ए-सहर भी है

सुरूर बाराबंकवी

तू उरूस-ए-शाम-ए-ख़याल भी तो जमाल-ए-रू-ए-सहर भी है

सुरूर बाराबंकवी

न किसी को फ़िक्र-ए-मंज़िल न कहीं सुराग़-ए-जादा

सुरूर बाराबंकवी

जब तलक रौशनी-ए-फ़िक्र-ओ-नज़र बाक़ी है

सुरूर बाराबंकवी

अच्छा लगता है मुझे!

सुरय्या अब्बास

सुनहरी धूप खिली है कई दिनों के ब'अद

सुनील आफ़ताब

वो आज मुझ से जब मिली तो धुँद छट गई

सुलतान सुबहानी

रात दिन शाम-ओ-सहर सब एक रंग

सुल्तान शाहिद

जीने की तमन्ना है न मरने की तमन्ना

सुलतान निज़ामी

किसी के वास्ते जीता है अब न मरता है

सुल्तान अख़्तर

ख़ाक उड़ती है ख़रीदार कहाँ खो गए हैं

सुल्तान अख़्तर

हरीफ़-ए-वक़्त हूँ सब से जुदा है राह मिरी

सुल्तान अख़्तर

न ढलती शाम न ठंडी सहर में रक्खा है

सुलेमान ख़ुमार

हिसाब-ए-उम्र करो या हिसाब-ए-जाम करो

सुलैमान अरीब

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