शाम Poetry (page 44)

ये कहाँ से मौज-ए-तरब उठी कि मलाल दिल से निकल गए

फ़रीद जावेद

ये कहाँ से मौज-ए-तरब उठी कि मलाल दिल से निकल गए

फ़रीद जावेद

क्या हो गया कैसी रुत पलटी मिरा चैन गया मिरी नींद गई

फ़रीद जावेद

फूलों की ताज़गी में उदासी है शाम की

फ़राज़ सुल्तानपूरी

इक दिल की ख़ातिर इतने तो फ़ित्ने कभी न थे

फ़राज़ सुल्तानपूरी

सारे मंज़र दिलकश थे हर बात सुहानी लगती थी

फ़रह इक़बाल

मुद्दतों हम से मुलाक़ात नहीं करते हैं

फ़रह इक़बाल

ख़ुद ही दिया जलाती हूँ

फ़रह इक़बाल

बहला न दिल न तीरगी-ए-शाम-ए-ग़म गई

फ़ानी बदायुनी

वो जी गया जो इश्क़ में जी से गुज़र गया

फ़ानी बदायुनी

क़िस्सा-ए-ज़ीस्त मुख़्तसर करते

फ़ानी बदायुनी

मुझ को मिरे नसीब ने रोज़-ए-अज़ल से क्या दिया

फ़ानी बदायुनी

मुझ पे रखते हैं हश्र में इल्ज़ाम

फ़ानी बदायुनी

लुत्फ़ ओ करम के पुतले हो अब क़हर ओ सितम का नाम नहीं

फ़ानी बदायुनी

हर साँस के साथ जा रहा हूँ

फ़ानी बदायुनी

गुज़र गया इंतिज़ार हद से ये वादा-ए-ना-तमाम कब तक

फ़ानी बदायुनी

हम आगही-ए-इश्क़ का अफ़्साना कहेंगे

फ़ना निज़ामी कानपुरी

चेहरा-ए-सुब्ह नज़र आया रुख़-ए-शाम के बाद

फ़ना निज़ामी कानपुरी

मिरे दाग़-ए-दिल वो चराग़ हैं नहीं निस्बतें जिन्हें शाम से

फ़ना बुलंदशहरी

जब तक मिरे होंटों पे तिरा नाम रहेगा

फ़ना बुलंदशहरी

तपता सूरज शाम को ढल जाएगा

फ़ैज़ी सम्बलपुरी

फिर ज़बान-ए-इश्क़ चश्म-ए-ख़ूँ-फिशाँ होने लगी

फ़ैज़ी निज़ाम पुरी

सुब्ह-ए-नौ लाती है हर शाम तुम्हें क्या मा'लूम

फ़ैज़ुल हसन

हम ने सहरा को सजाया था गुलिस्ताँ की तरह

फ़ैज़ुल हसन

दिन उतरते ही नई शाम पहन लेता हूँ

फ़ैज़ ख़लीलाबादी

दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

तुम्हारे हुस्न के नाम

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

सुरुद-ए-शबाना

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

शोर-ए-बरबत-ओ-नय

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

शाम

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

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