शाम Poetry (page 43)

पूरे क़द से मैं खड़ा हूँ सामने आएगा क्या

फ़ारूक़ नाज़की

गहरी नीली शाम का मंज़र लिखना है

फ़ारूक़ नाज़की

ऐ मरकज़-ए-ख़याल बिखरने लगा हूँ मैं

फ़ारूक़ नाज़की

ए मरकज़-ए-ख़याल बिखरने लगा हूँ में

फ़ारूक़ नाज़की

उजले माथे पे नाम लिख रक्खें

फ़ारूक़ मुज़्तर

सोच भी उस दिन को जब तू ने मुझे सोचा न था

फ़ारूक़ मुज़्तर

सलीब-ए-मौजा-ए-आब-ओ-हवा पे लिक्खा हूँ

फ़ारूक़ मुज़्तर

ब-रोज़-ए-हश्र मिरे साथ दिल-लगी ही तो है

फ़ारूक़ बाँसपारी

वो रोज़-ओ-शब भी नहीं हैं वो रंग-ओ-बू भी नहीं

फ़ारिग़ बुख़ारी

वो रोज़-ओ-शब भी नहीं है वो रंग-ओ-बू भी नहीं

फ़ारिग़ बुख़ारी

कुछ नहीं गरचे तिरी राहगुज़र से आगे

फ़ारिग़ बुख़ारी

जब तक चराग़-ए-शाम-ए-तमन्ना जले चलो

फ़रहत शहज़ाद

दो झुकी आँखों का पहुँचा जब मिरे दिल को सलाम

फ़रहत शहज़ाद

तिरा जल्वा शाम-ओ-सहर देखते हैं

फ़रहत कानपुरी

वो चाँद कह के गया था कि आज निकलेगा

फ़रहत एहसास

तहरीर की फ़ुर्सत

फ़रहत एहसास

रात हुई

फ़रहत एहसास

तेरे सूरज को तिरी शाम से पहचानते हैं

फ़रहत एहसास

रक़्स-ए-इल्हाम कर रहा हूँ

फ़रहत एहसास

लगे हुए हैं ज़माने के इंतिज़ाम में हम

फ़रहत एहसास

ख़लल आया न हक़ीक़त में न अफ़्साना बना

फ़रहत एहसास

खड़ी है रात अंधेरों का अज़दहाम लगाए

फ़रहत एहसास

झगड़े ख़ुदा से हो गए अहद-ए-शबाब में

फ़रहत एहसास

कभी सहर तो कभी शाम ले गया मुझ से

फ़रहत अब्बास शाह

तू ने देखा है कभी एक नज़र शाम के बा'द

फ़रहत अब्बास शाह

कभी सहर तो कभी शाम ले गया मुझ से

फ़रहत अब्बास शाह

ये क्या हुआ कि सभी अब तो दाग़ जलने लगे

फ़रहान सालिम

उदास शाम में पज़मुर्दा बाद बन के न आ

फ़रहान सालिम

शुहूद-ए-दिल-ज़दगाँ मंज़रों में रख आना

फ़रहान सालिम

शौक़ आसूदा-ए-तहलील-ए-मुअम्मा न हुआ

फ़रहान सालिम

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