शाम Poetry (page 8)

दर्द जूँ शम्अ' मिले है शब-ए-हिज्राँ मुझ को

वली उज़लत

ख़ूब-रू ख़ूब काम करते हैं

वली मोहम्मद वली

जी का जंजाल है इश्क़ मियाँ क़िस्सा ये तमाम करो 'वाली'

वाली आसी

हम जो दिन-रात ये इत्र-ए-दिल-ओ-जाँ खींचते हैं

वाली आसी

लहूलुहान समुंदर भी देखना है अभी

वाजिद क़ुरैशी

मोहब्बत के तआ'क़ुब में थकन से चूर होने तक

वजीह सानी

शौक़ देता है मुझे पैग़ाम-ए-इश्क़

वहशत रज़ा अली कलकत्वी

नालों से अगर मैं ने कभी काम लिया है

वहशत रज़ा अली कलकत्वी

हुस्न की ज़बान से

वहीदुद्दीन सलीम

है शाम-ए-अवध गेसू-ए-दिलदार का परतव

वाहिद प्रेमी

पस-ए-दीवार-ए-ज़िंदाँ

वहीद क़ुरैशी

हम ने देखा है मोहब्बत का सज़ा हो जाना

वहीद अख़्तर

शाम के दिन रात

वहीद अहमद

आग दरिया को इशारों से लगाने वाला

विशाल खुल्लर

इक लम्हा-ए-फ़िराक़ पे वारा गया मुझे

विपुल कुमार

तिरे ग़ुरूर मिरे ज़ब्त का सवाल रहा

विजय शर्मा अर्श

लाख नादाँ हैं मगर इतनी सज़ा भी न मिले

वारिस किरमानी

खोए हुए सहरा तक ऐ बाद-ए-सबा जाना

वारिस किरमानी

जमाल-ए-नस्तरनी रंग-ओ-बू-ए-यासमनी

वारिस किरमानी

बहुत दिनों में हम उन से जो हम-कलाम हुए

वारिस किरमानी

फैला न यूँ ख़ुलूस की चादर मिरे लिए

वली मदनी

किसी के फ़ैज़-ए-क़ुर्ब से हयात अब सँवर गई

उनवान चिश्ती

रूठना चाहो तो अब हरगिज़ मनाने का नहीं

उम्मीद ख़्वाजा

इश्क़ में हर तमन्ना-ए-क़ल्ब-ए-हज़ीं सुर्ख़ आँसू बहाए तो मैं क्या करूँ

तुर्फ़ा क़ुरैशी

हम से पहले भी इस जग में पीत हुई है मन टूटे हैं

तुफ़ैल दारा

नूर-जहाँ का मज़ार

तिलोकचंद महरूम

छब्बीस जनवरी

तिलोकचंद महरूम

वो आई शाम-ए-ग़म वक़्फ़-ए-बला होने का वक़्त आया

तिलोकचंद महरूम

बदनाम हूँ पर आशिक़-ए-बदनाम तुम्हारा

तिलोकचंद महरूम

इक तीर नहीं क्या तिरी मिज़्गाँ की सफ़ों में

तौसीफ़ तबस्सुम

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