शहर Poetry (page 15)

कोई भी शहर में खुल कर न बग़ल-गीर हुआ

सुल्तान अख़्तर

ख़ाना-बर्बाद हुए बे-दर-ओ-दीवार रहे

सुल्तान अख़्तर

कल रात मेरे साथ अजब हादिसा हुआ

सुलेमान ख़ुमार

बीमार सा है जिस्म-ए-सहर काँप रहा है

सुलेमान ख़ुमार

तिरा दिल तो नहीं दिल की लगी हूँ

सुलैमान अरीब

वो मिज़ाज दिल के बदल गए कि वो कारोबार नहीं रहा

सुलैमान अहमद मानी

अपने ही आप में असीर हूँ मैं

सुलैमान अहमद मानी

किसी की याद में शमएँ जलाना भूल जाता है

सुहैल सानी

कि ख़ुद-नुमाई न तश्हीर चाहते हैं हम

सुहैल अख़्तर

हमारे जैसे ही लोगों से शहर भर गए हैं

सुहैल अख़्तर

देखो तो हर इक शख़्स के हाथों में हैं पत्थर

सुहैल अहमद ज़ैदी

सफ़र में अब भी आदतन सराब देखता हूँ मैं

सुहैल अहमद ज़ैदी

सफ़र करो तो इक आलम दिखाई देता है

सुहैल अहमद ज़ैदी

साए के लिए है न ठिकाने के लिए है

सुहैल अहमद ज़ैदी

मैं खो गया तो शहर-ए-फ़न में दस्तियाब हो गया

सुहैल अहमद ज़ैदी

जैसा हमें गुमान था वैसा नहीं रहा

सुहैल अहमद ज़ैदी

जाँ तन का साथ दे न तो दिल ही वफ़ा करे

सुहैल अहमद ज़ैदी

फ़क़ीह-ए-शहर से रिश्ता बनाए रहता हूँ

सुहैल अहमद ज़ैदी

आँखों को मयस्सर कोई मंज़र ही नहीं था

सुहैल अहमद ज़ैदी

वो एक लड़की जो ख़ंदा-लब थी न जाने क्यूँ चश्म-तर गई वो

सूफ़िया अनजुम ताज

ग़म-नसीबों को किसी ने तो पुकारा होगा

सूफ़ी तबस्सुम

पत्थर के ख़ुदा पत्थर के सनम पत्थर के ही इंसाँ पाए हैं

सुदर्शन फ़ाकिर

ये भी हुआ कि फ़ाइलों के दरमियाँ मिलीं

सुबोध लाल साक़ी

बढ़ा जो दर्द-ए-जिगर ग़म से दोस्ती कर ली

सुभाष पाठक ज़िया

इक रौशनी का ज़हर था जो आँख भर गया

सोहन राही

तुम ने महसूस कहाँ मेरी ज़रूरत की है

सिया सचदेव

तसव्वुरात में दिल की उड़ान देख ज़रा

सिया सचदेव

फ़सील-ए-दर्द को मैं मिस्मार करने वाली हूँ

सिया सचदेव

अब तिरे शहर से चुप-चाप गुज़रना होगा

सिया सचदेव

हम दिल-ए-ज़ोहरा-वशाँ में ख़ालिक़-ए-अंदेशा हैं

सिराजुद्दीन ज़फ़र

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