शहर Poetry (page 17)

रुका तो राज़ खुला कब से अपने घर में था

शुजाअत अली राही

उस बेवफ़ा का शहर है और वक़्त-ए-शाम है

शुजा ख़ावर

उस बेवफ़ा का शहर है और वक़्त-ए-शाम है

शुजा ख़ावर

उधर तो दार पर रक्खा हुआ है

शुजा ख़ावर

निकाल ज़ात से बाहर निकाल तन्हाई

शुजा ख़ावर

लोगों ने हम को शहर का क़ाज़ी बना दिया

शुजा ख़ावर

ख़ुदा को आज़माना चाहिए था

शुजा ख़ावर

जो क़िस्सा था ख़ुद से छुपाया हुआ

शुजा ख़ावर

इस ए'तिबार से बे-इंतिहा ज़रूरी है

शुजा ख़ावर

हालात न बदलें तो इसी बात पे रोना

शुजा ख़ावर

छोड़िए बाक़ी भी क्या रक्खा है उन के क़हर में

शुजा ख़ावर

चलो ये तो हादसा हो गया कि वो साएबान नहीं रहा

शुजा ख़ावर

बरपा तिरे विसाल का तूफ़ान हो चुका

शुजा ख़ावर

सहरा में कड़ी धूप का डर होते हुए भी

शोज़ेब काशिर

एहसास की दीवार गिरा दी है चला जा

शोज़ेब काशिर

बहता है कोई ग़म का समुंदर मिरे अंदर

शोज़ेब काशिर

अब जी रहा हूँ गर्दिश-ए-दौराँ के साथ साथ

शोरिश काश्मीरी

उस ने फिर और क्या कहा होगा

शोला हस्पानवी

अपना ख़ालिक़ ख़ुद ही था मेरा ख़ुदा कोई न था

शोला हस्पानवी

साँस की आस निगहबाँ है ख़बर-दार रहो

शोहरत बुख़ारी

जब मंज़िलों वहम था न शब का

शोहरत बुख़ारी

जाने क्या बात है मानूस बहुत लगता है

शोहरत बुख़ारी

हम शहर में इक शम्अ की ख़ातिर हुए बर्बाद

शोहरत बुख़ारी

इक ज़माने से फ़लक ठहरा हुआ लगता है

शोहरत बुख़ारी

अपनों से मुरव्वत का तक़ाज़ा नहीं करते

शोहरत बुख़ारी

टूटे हुए ख़्वाबों के तलबगार भी आए

शोएब निज़ाम

दिल-ए-आबाद का बर्बाद भी होना ज़रूरी है

शोएब बिन अज़ीज़

चाहे दीवाना कहें या लोग सौदाई कहें

शिव रतन लाल बर्क़ पूंछवी

ज़िंदगी रैन-बसेरे के सिवा कुछ भी नहीं

शेर अफ़ज़ल जाफ़री

मेरी नज़र का मुद्दआ उस के सिवा कुछ भी नहीं

शहपर रसूल

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