शहर Poetry (page 18)

ख़ुद को ख़ुद पर ही जो इफ़्शा कभी करना पड़ जाए

शहपर रसूल

हमारे दर्द की जानिब इशारा करती हैं

शहपर रसूल

चुप गुज़र जाता हूँ हैरान भी हो जाता हूँ

शहपर रसूल

रक़ाबतों की तरह से हम ने मोहब्बतें बे-मिसाल की हैं

शीश मोहम्मद इस्माईल आज़मी

अजीब आदत है बे-सबब इंतिज़ार करना

शीश मोहम्मद इस्माईल आज़मी

पुरखों से जो मिली है वो दौलत भी ले न जाए

शीन काफ़ निज़ाम

किसी के साथ अब साया नहीं है

शीन काफ़ निज़ाम

ज़मीं का क़र्ज़

शाज़ तमकनत

दर-गुज़र

शाज़ तमकनत

छटा आदमी

शाज़ तमकनत

मेरी वहशत का तिरे शहर में चर्चा होगा

शाज़ तमकनत

क्या क़यामत है कि इक शख़्स का हो भी न सकूँ

शाज़ तमकनत

क्या करूँ रंज गवारा न ख़ुशी रास मुझे

शाज़ तमकनत

कोई तन्हाई का एहसास दिलाता है मुझे

शाज़ तमकनत

ख़ुद अपना हाल दिल-ए-मुब्तला से कुछ न कहा

शाज़ तमकनत

जाने वाले तुझे कब देख सकूँ बार-ए-दिगर

शाज़ तमकनत

जाने क्या क़ीमत-ए-अरबाब-ए-वफ़ा ठहरेगी

शाज़ तमकनत

छोड़ दूँ शहर तिरा छोड़ दूँ दुनिया तेरी

शाज़ तमकनत

राह-ए-वफ़ा में साया-ए-दीवार-ओ-दर भी है

शायान क़ुरैशी

बिखरे तो फिर बहम मिरे अज्ज़ा नहीं हुए

शाैकत वास्ती

बिखरे तो फिर बहम मिरे अज्ज़ा नहीं हुए

शाैकत वास्ती

तिरी साज़िशों से ही जुगनू मरे

शाैकत हाशमी

ये रात कितनी भयानक है बाम-ओ-दर के लिए

शातिर हकीमी

रात थी जब तुम्हारा शहर आया

शारिक़ कैफ़ी

अपने तमाशे का टिकट

शारिक़ कैफ़ी

ख़्वाब ऐसा भी नज़र आया है अक्सर मुझ को

शारिक़ जमाल

देख न पाया जिस पैकर को वादों की अँगनाई में

शारिक़ जमाल

अधूरा जिस्म लिए पीछे हट रहा हूँ मैं

शारिक़ जमाल

हवा के दोश पे बादल की मुश्क ख़ाली है

शारिब मौरान्वी

बयान सफ़ाई

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

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