शहर Poetry (page 20)

इक्का दुक्का शाज़-ओ-नादिर बाक़ी हैं

शमीम अब्बास

जाते कहाँ जुनून के तूफ़ाँ में आ गए

शाकिर इनायती

तेरी नज़र के सामने ये दिल नहीं रहा

शकील शम्सी

पलकों पे लरज़ते रहे आँसू की तरह हम

शकील शम्सी

किसी की आँख से आँसू टपक रहे होंगे

शकील शम्सी

तेरी नज़रों में तो अबरू में कमाँ ढूँडता हूँ

शकील जाज़िब

मुझ को तिरे ख़याल से वहशत कभी न थी

शकील जाज़िब

किन ज़मीनों पे उतारोगे इमदाद का क़हर

शकील जमाली

तुम शुजाअ'त के कहाँ क़िस्से सुनाने लग गए

शकील जमाली

पेट की आग बुझाने का सबब कर रहे हैं

शकील जमाली

मसअला ख़त्म हुआ चाहता है

शकील जमाली

झूट सच्चाई का हिस्सा हो गया

शकील जमाली

अश्क पीने के लिए ख़ाक उड़ाने के लिए

शकील जमाली

ये सिलसिला ग़मों का न जाने कहाँ से है

शकील ग्वालिआरी

ये दिल हर इक नई कोशिश पे यूँ धड़कता है

शकील ग्वालिआरी

शहर का शहर जानता है मुझे

शकील ग्वालिआरी

ख़्वाबों की रहगुज़र से ख़यालों की राह से

शकील ग्वालिआरी

हादसे शहर का दस्तूर बने जाते हैं

शकील आज़मी

ज़िंदा रहना है तो साँसों का ज़ियाँ और सही

शकील आज़मी

परों को खोल ज़माना उड़ान देखता है

शकील आज़मी

धूप से बर-सर-ए-पैकार किया है मैं ने

शकील आज़मी

चढ़ा हुआ है जो दरिया उतरने वाला है

शकील आज़मी

बात से बात की गहराई चली जाती है

शकील आज़मी

अपनी हस्ती को मिटा दूँ तिरे जैसा हो जाऊँ

शकील आज़मी

अब इस से मिलने की उम्मीद क्या गुमाँ भी नहीं

शकील आज़मी

पर्दा-ए-शब की ओट में ज़ोहरा-जमाल खो गए

शकेब जलाली

जिस दम क़फ़स में मौसम-ए-गुल की ख़बर गई

शकेब जलाली

ग़म-ए-उल्फ़त मिरे चेहरे से अयाँ क्यूँ न हुआ

शकेब जलाली

ग़म-ए-दिल हीता-ए-तहरीर में आता ही नहीं

शकेब जलाली

दिल के वीराने में इक फूल खिला रहता है

शकेब जलाली

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