शहर Poetry (page 22)

शहर का शहर अगर आए भी समझाने को

शहज़ाद अहमद

न सही कुछ मगर इतना तो किया करते थे

शहज़ाद अहमद

न बस्तियों को अज़ीज़ रक्खें न हम बयाबाँ से लौ लगाएँ

शहज़ाद अहमद

मुंतज़िर दश्त-ए-दिल-ओ-जाँ है कि आहू आए

शहज़ाद अहमद

लगे थे ग़म तुझे किस उम्र में ज़माने के

शहज़ाद अहमद

कोशिश है शर्त यूँही न हथियार फेंक दे

शहज़ाद अहमद

कहीं भी साया नहीं किस तरफ़ चले कोई

शहज़ाद अहमद

कब तक कड़कती धूप में आँखें जलाएँ हम

शहज़ाद अहमद

जान मुक़द्दर में थी जान से प्यारा न था

शहज़ाद अहमद

इस भरे शहर में आराम मैं कैसे पाऊँ

शहज़ाद अहमद

हिज्र की रात मिरी जाँ पे बनी हो जैसे

शहज़ाद अहमद

घर जला लेता है ख़ुद अपने ही अनवार से तू

शहज़ाद अहमद

दिल से ये कह रहा हूँ ज़रा और देख ले

शहज़ाद अहमद

दरिया कभी इक हाल में बहता न रहेगा

शहज़ाद अहमद

भटकती हैं ज़माने में हवाएँ

शहज़ाद अहमद

अगरचे कार-ए-दुनिया कुछ नहीं है

शहज़ाद अहमद

अब निभानी ही पड़ेगी दोस्ती जैसी भी है

शहज़ाद अहमद

सीने में जलन आँखों में तूफ़ान सा क्यूँ है

शहरयार

मुझ को ले डूबा तिरा शहर में यकता होना

शहरयार

काग़ज़ की कश्तियाँ भी बहुत काम आएँगी

शहरयार

वो कौन था

शहरयार

साए

शहरयार

नया खेल

शहरयार

एक ख़ुश-ख़बरी

शहरयार

एक और साल गिरह

शहरयार

ज़मीं से ता-ब-फ़लक धुँद की ख़ुदाई है

शहरयार

ये क़ाफ़िले यादों के कहीं खो गए होते

शहरयार

तिलिस्म ख़त्म चलो आह-ए-बे-असर का हुआ

शहरयार

तेरे सिवा भी कोई मुझे याद आने वाला था

शहरयार

तमाम ख़ल्क़-ए-ख़ुदा देख के ये हैराँ है

शहरयार

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