शहर Poetry (page 24)

न जाने क्या हुए अतराफ़ देखने वाले

शाहिद मीर

कहीं कुछ नहीं होता

शाहिद माहुली

अजीब लोग

शाहिद माहुली

रग रग में मेरी फैल गया है ये कैसा ज़हर

शाहिद माहुली

रात ऐसी कि कभी जिस का सवेरा न हुआ

शाहिद माहुली

कुछ दर्द बढ़ा है तो मुदावा भी हुआ है

शाहिद माहुली

कश्ती रवाँ-दवाँ थी समुंदर खुला हुआ

शाहिद माहुली

कश्ती रवाँ-दवाँ थी समुंदर खुला हुआ

शाहिद माहुली

ग़म की तहज़ीब अज़िय्यत का क़रीना सीखें

शाहिद माहुली

ग़म की तहज़ीब अज़िय्यत का क़रीना सीखें

शाहिद माहुली

भटक रही है अंधेरों में आँख देखे क्या

शाहिद माहुली

कोई लहजा कोई जुमला कोई चेहरा निकल आया

शाहिद लतीफ़

ज़ख़्म-ए-जिगर को दस्त-ए-जराहत से पूछिए

शाहिद कमाल

सब हैं मसरूफ़ किसी को यहाँ फ़ुर्सत नहीं है

शाहिद कमाल

नन्हा सा दिया है कि तह-ए-आब है रौशन

शाहिद कमाल

मक़्तल में चमकती हुई तलवार थे हम लोग

शाहिद कमाल

जो मिरी पुश्त में पैवस्त है उस तीर को देख

शाहिद कमाल

जो इस चमन में ये गुल सर्व-ओ-यासमन के हैं

शाहिद कमाल

इस अरसा-ए-महशर से गुज़र क्यूँ नहीं जाते

शाहिद कमाल

हवा की डोर में टूटे हुए तारे पिरोती है

शाहिद कमाल

ग़मों की रात है और इतनी मुख़्तसर भी नहीं

शाहिद कमाल

धूप के ज़र्द जज़ीरों में नुमू ज़िंदा है

शाहिद कमाल

अपनी तन्हाई का सामान उठा लाए हैं

शाहिद कमाल

तिरी थकी हुई आँखों में ख़्वाब था कि नहीं

शाहिद कलीम

लहू का दाग़ न था ज़ख़्म का निशान न था

शाहिद कलीम

जलती बुझती हुई शम्ओं का धुआँ रहता है

शाहिद कलीम

अंधेरे घर में चराग़ों से कुछ न काम लिया

शाहिद कलीम

पुकारती है जो तुझ को तिरी सदा ही न हो

शाहिद कबीर

रात है शहर-ए-बुताँ है और हम

शाहिद इश्क़ी

रात भी बाक़ी है सहबा भी शीशा भी पैमाना भी

शाहिद इश्क़ी

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