शहर Poetry (page 5)

बम फटे लोग मरे ख़ून बहा शहर लुटे

ज़हीर ग़ाज़ीपुरी

दर्द इन दिनों यूँ चेहरा-ए-आलम पे सजा है

ज़हीर फ़तेहपूरी

जो ज़ेहन ओ दिल में इकट्ठा था आस का पानी

ज़हीर अहमद ज़हीर

सो रहे थे शहर भी जंगल भी जब

ज़फ़र ताबिश

गिर गए जब सब्ज़ मंज़र टूट कर

ज़फ़र ताबिश

तमाम शहर में कोई भी रू-शनास न था

ज़फ़र सिद्दीक़ी

ये क्या तहरीर पागल लिख रहा है

ज़फ़र सहबाई

अमीर-ए-शहर इस इक बात से ख़फ़ा है बहुत

ज़फ़र सहबाई

क्या ख़बर किस मोड़ पर बिखरे मता-ए-एहतियात

ज़फ़र मुरादाबादी

बे-क़नाअत क़ाफ़िले हिर्स-ओ-हवा ओढ़े हुए

ज़फ़र मुरादाबादी

फूला-फला शजर तो समर पर भी आएगा

ज़फ़र कलीम

नवा-ए-हक़ पे हूँ क़ातिल का डर अज़ीज़ नहीं

ज़फ़र कलीम

इन दिनों मैं ग़ुर्बतों की शाम के मंज़र में हूँ

ज़फ़र कलीम

ज़िंदगी को शो'बदा समझा था मैं

ज़फ़र इक़बाल ज़फ़र

सफ़र का सिलसिला आख़िर कहाँ तमाम करूँ

ज़फ़र इक़बाल ज़फ़र

चमका जो तीरगी में उजाला बिखर गया

ज़फ़र इक़बाल ज़फ़र

आइना देखें न हम अक्स ही अपना देखें

ज़फ़र इक़बाल ज़फ़र

ये शहर ज़िंदा है लेकिन हर एक लफ़्ज़ की लाश

ज़फ़र इक़बाल

करता हूँ नींद में ही सफ़र सारे शहर का

ज़फ़र इक़बाल

ज़िंदा भी ख़ल्क़ में हूँ मरा भी हुआ हूँ मैं

ज़फ़र इक़बाल

'ज़फ़र' फ़सानों कि दास्तानों में रह गए हैं

ज़फ़र इक़बाल

ये बात अलग है मिरा क़ातिल भी वही था

ज़फ़र इक़बाल

यहाँ किसी को भी कुछ हस्ब-ए-आरज़ू न मिला

ज़फ़र इक़बाल

तिरे रास्तों से जभी गुज़र नहीं कर रहा

ज़फ़र इक़बाल

रुख़-ए-ज़ेबा इधर नहीं करता

ज़फ़र इक़बाल

परियों ऐसा रूप है जिस का लड़कों ऐसा नाँव

ज़फ़र इक़बाल

पाए हुए इस वक़्त को खोना ही बहुत है

ज़फ़र इक़बाल

मैं ज़र्द आग न पानी के सर्द डर में रहा

ज़फ़र इक़बाल

कुछ नहीं समझा हूँ इतना मुख़्तसर पैग़ाम था

ज़फ़र इक़बाल

ख़ुशी मिली तो ये आलम था बद-हवासी का

ज़फ़र इक़बाल

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