शहर Poetry (page 55)

तुम्हारे शहर में आँगन नहीं है

ग़ौस सीवानी

कभी गुमान कभी ए'तिबार बन के रहा

ग़ालिब अयाज़

जहाँ ख़राब सही हम बदन-दरीदा सही

ग़ालिब अयाज़

हुआ है शह का मुसाहिब फिरे है इतराता

ग़ालिब

वाँ पहुँच कर जो ग़श आता पए-हम है हम को

ग़ालिब

जुज़ क़ैस और कोई न आया ब-रू-ए-कार

ग़ालिब

हर क़दम दूरी-ए-मंज़िल है नुमायाँ मुझ से

ग़ालिब

हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है

ग़ालिब

है बस-कि हर इक उन के इशारे में निशाँ और

ग़ालिब

गई वो बात कि हो गुफ़्तुगू तो क्यूँकर हो

ग़ालिब

एक एक क़तरे का मुझे देना पड़ा हिसाब

ग़ालिब

कि इस से पहले ख़िज़ाँ का शिकार हो जाऊँ

गौतम राजऋषि

साँप! आ काट मुझे

गौहर नौशाही

अर्ज़-ए-दकन में जान तो दिल्ली में दिल बनी

गणेश बिहारी तर्ज़

वो मौज-ए-ख़ुनुक शहर-ए-शरर तक नहीं आई

फ़ुज़ैल जाफ़री

तेज़ आँधी रात अँधयारी अकेला राह-रौ

फ़ुज़ैल जाफ़री

रुख़ हवाओं के किसी सम्त हों मंज़र हैं वही

फ़ुज़ैल जाफ़री

मैं उजड़ा शहर था तपता था दश्त के मानिंद

फ़ुज़ैल जाफ़री

लफ़्ज़ों का साएबान बना लेने दीजिए

फ़ुज़ैल जाफ़री

ख़ून पलकों पे सर-ए-शाम जमेगा कैसे

फ़ुज़ैल जाफ़री

कैसा मकान साया-ए-दीवार भी नहीं

फ़ुज़ैल जाफ़री

कैसा मकान साया-ए-दीवार भी नहीं

फ़ुज़ैल जाफ़री

दीवाने इतने जम्अ' हुए शहर बन गया

फ़ुज़ैल जाफ़री

चेहरे मकान राह के पत्थर बदल गए

फ़ुज़ैल जाफ़री

नए जहाँ में पुरानी शराब ले आए

फ़ितरत अंसारी

अब नहीं कोई ठिकाना अपना

फ़ीरोज़ा ख़ुसरो

दोस्तों की अता है ख़ामोशी

फ़िरदौस गयावी

अब क्या बताऊँ शहर ये कैसा लगा मुझे

फ़िरदौस गयावी

बड़ा ग़ुरूर है पल भर की नेक-नामी का

फ़िराक़ जलालपुरी

जुगनू

फ़िराक़ गोरखपुरी

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