शहर Poetry (page 63)

रवानी ग़म की जिस में थी वो जौहर दे दिया मैं ने

दिलदार हाश्मी

तरही ग़ज़ल

दिलावर फ़िगार

तमाशा मिरे आगे

दिलावर फ़िगार

रिश्वत-ख़ोर सरकारी मुलाज़मीन

दिलावर फ़िगार

मर्दुम-गज़ीदा इंसान का इलाज

दिलावर फ़िगार

कराची का क़ब्रिस्तान

दिलावर फ़िगार

कहा लैला की माँ ने

दिलावर फ़िगार

'ग़ालिब' को बुरा क्यूँ कहो

दिलावर फ़िगार

चालीस चोर

दिलावर फ़िगार

अहमक़ों की कांफ्रेंस

दिलावर फ़िगार

ज़हर बीमार को मुर्दे को दवा दी जाए

दिलावर फ़िगार

वो शख़्स कभी जिस ने मिरा घर नहीं देखा

दिलावर फ़िगार

उट्ठी नहीं है शहर से रस्म-ए-वफ़ा अभी

दिलावर फ़िगार

मैं ने कहा कि शहर के हक़ में दुआ करो

दिलावर फ़िगार

ज़मीन अपने ही मेहवर से हट रही होगी

दिलावर अली आज़र

लम्हा लम्हा वुसअत-ए-कौन-ओ-मकाँ की सैर की

दिलावर अली आज़र

हवस से जिस्म को दो-चार करने वाली हवा

दिलावर अली आज़र

इस शहर में तो कुछ नहीं रुस्वाई के सिवा

दिल अय्यूबी

फिर मरहला-ए-ख़्वाब-ए-बहाराँ से गुज़र जा

दिल अय्यूबी

मैं सिर्फ़ वो नहीं जो नज़र आ गया तुझे

दिल अय्यूबी

हसीं है शहर तो उजलत में क्यूँ गुज़र जाएँ

दिल अय्यूबी

कश्तियाँ मंजधार में हैं नाख़ुदा कोई नहीं

देवमणि पांडेय

हम तुझ से किस हवस की फ़लक जुस्तुजू करें

ख़्वाजा मीर 'दर्द'

शहर से क्या गई जानिब-ए-दश्त-ए-ज़र ज़िंदगी फ़ाख़्ता

दानियाल तरीर

साकित हो मगर सब को रवानी नज़र आए

दानियाल तरीर

कोई सिवा-ए-बदन है न है वरा-ए-बदन

दानियाल तरीर

साक़ी मुझे शबाब का रसिया कहे सो हूँ

दानिश नज़ीर दानी

हम को छेड़ा तो मचल जाएँगे अरमाँ की तरह

डी. राज कँवल

नज़्म

चाैधरी मोहम्मद नईम

गुम-शुदा आदमी का इंतिज़ार

चन्द्रभान ख़याल

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