शहर Poetry (page 61)

ऐ रौशनियों के शहर

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

आज इक हर्फ़ को फिर ढूँडता फिरता है ख़याल

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

आज बाज़ार में पा-ब-जौलाँ चलो

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

यूँ बहार आई है इस बार कि जैसे क़ासिद

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

वहीं हैं दिल के क़राइन तमाम कहते हैं

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

शैख़ साहब से रस्म-ओ-राह न की

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

सभी कुछ है तेरा दिया हुआ सभी राहतें सभी कुल्फ़तें

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

फिर आईना-ए-आलम शायद कि निखर जाए

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

किस शहर न शोहरा हुआ नादानी-ए-दिल का

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

कब ठहरेगा दर्द ऐ दिल कब रात बसर होगी

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

हम मुसाफ़िर यूँही मसरूफ़-ए-सफ़र जाएँगे

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

गो सब को बहम साग़र ओ बादा तो नहीं था

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

दरबार में अब सतवत-ए-शाही की अलामत

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

आज यूँ मौज-दर-मौज ग़म थम गया इस तरह ग़म-ज़दों को क़रार आ गया

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

जहाँ में ख़ुद को बनाने में देर लगती है

फ़ैय्याज़ रश्क़

मैं ग़ार में था और हवा के बग़ैर था

फ़ैसल अजमी

एक रात की कहानी

फ़हमीदा रियाज़

चार-सू है बड़ी वहशत का समाँ

फ़हमीदा रियाज़

नहीं हो तुम तो ऐसा लग रहा है

फ़हमी बदायूनी

राहदारी में गूँजती नज़्म

फ़हीम शनास काज़मी

हादसा

फ़हीम शनास काज़मी

ऐ मुबारज़-तलब

फ़हीम शनास काज़मी

इन उजड़ी बस्तियों का कोई तो निशाँ रहे

एज़ाज़ अहमद आज़र

ये शहर ये ख़्वाबों का समुंदर न बचेगा

एज़ाज़ अफ़ज़ल

सरहद-ए-जल्वा से जो आगे निकल जाएगी

एज़ाज़ अफ़ज़ल

लहू ने क्या तिरे ख़ंजर को दिलकशी दी है

एज़ाज़ अफ़ज़ल

जिस्म ही पामाल हो जाए तो सर क्या कीजिए

एज़ाज़ अफ़ज़ल

मय-ख़ाना है बिना-ए-शर-ओ-ख़ैर तो नहीं

एजाज़ वारसी

कहाँ सबात-ए-ग़म-ए-दिल कहाँ सराब-ए-सुकूँ

एजाज़ वारसी

जिस को देखो बेवफ़ा है आइनों के शहर में

एजाज़ वारसी

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