शहर Poetry (page 60)

शहर-दर-शहर दीदा-वर भटके

फ़रहत अब्बास

वो क़ाफ़िला जो रह-ए-शाएरी में कम उतरा

फ़रहान सालिम

हमा-जिहत मिरी तलब जिस की मिसाल अब नहीं

फ़रीद परबती

क्या बदल दोगे तुम इक नज़र से

फ़रीद जावेद

कभी यक़ीं से हुई और कभी गुमाँ से हुई

फ़राग़ रोहवी

कभी हरीफ़ कभी हम-नवा हमीं ठहरे

फ़राग़ रोहवी

ऐ हम-सफ़रो क्यूँ न यहीं शहर बसा लें

फख्र ज़मान

कुछ बात नहीं जिस्म अगर मेरा जला है

फख्र ज़मान

जो धूप की तपती हुई साँसों से बची सोच

फख्र ज़मान

ऐ हम-सफ़रो क्यूँ न नया शहर बसा लें

फख्र ज़मान

घर से तुम्हारी दी हुई चीज़ें निकाल दें

फख़्र अब्बास

इसी जहाज़ के सहरा में डूब जाने की

फ़ैज़ान हाशमी

वो जितने दूर हैं उतने ही मेरे पास भी हैं

फ़ैज़ुल हसन

काँच के शहर में पत्थर न उठाओ यारो

फ़ैज़ुल हसन

हम ने सहरा को सजाया था गुलिस्ताँ की तरह

फ़ैज़ुल हसन

हम सहल-तलब कौन से फ़रहाद थे लेकिन

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

ज़िंदगी

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

ये मातम-ए-वक़्त की घड़ी है

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

यहाँ से शहर को देखो

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

टूटी जहाँ जहाँ पे कमंद

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

सोचने दो

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

शहर-ए-याराँ

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

क़ैद-ए-तन्हाई

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

पैरिस

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

लाओ तो क़त्ल-नामा मिरा

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

क्या करें

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

फ़लस्तीनी शोहदा जो परदेस में काम आए

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

एक शहर-आशोब का आग़ाज़

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

एक नग़्मा करबला-ए-बैरुत के लिए

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

दिलदार देखना

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

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