शहर Poetry (page 64)

हिजाब बन के वो मेरी नज़र में रहता है

चंद्र प्रकाश जौहर बिजनौरी

जले चराग़ बुझाने की ज़िद नहीं करते

चाँदनी पांडे

नई-देहली

चंद्रभान कैफ़ी देहल्वी

हम से यूँ बे-रुख़ी से मिलते हैं

चमन लाल चमन

ये शहर-ए-ना-रसाई है

बुशरा एजाज़

मोहब्बत में कोई सदमा उठाना चाहिए था

बुशरा एजाज़

आसमाँ है समुंदर पे छाया हुआ

बृजेश अम्बर

साज़-ए-हस्ती का अजब जोश नज़र आता है

बिस्मिल इलाहाबादी

कितना अजीब शब का ये मंज़र लगा मुझे

बिस्मिल आग़ाई

कैसे कहें कि चार तरफ़ दायरा न था

बिमल कृष्ण अश्क

जो दिल में उस को बसाए वो और कुछ न करे

बिमल कृष्ण अश्क

जिस्म में ख़्वाहिश न थी एहसास में काँटा न था

बिमल कृष्ण अश्क

जिस की हर बात में क़हक़हा जज़्ब था मैं न था दोस्तो

बिमल कृष्ण अश्क

हम से भली चाल चली चाँदनी

बिमल कृष्ण अश्क

दहशत-ज़दा ज़मीं पर वहशत भरे मकाँ ये

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

नज़र आता है वो जैसा नहीं है

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

किस ने कहा किसी का कहा तुम किया करो

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

कब इक मक़ाम पे रुकती है सर-फिरी है हवा

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

दीवार-ओ-दर में सिमटा इक लम्स काँपता है

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

बे-तअल्लुक़ सारे रिश्ते कौन किस का आश्ना

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

मुसाफ़िरों का यहाँ से गुज़र नहीं है क्या

बिल्क़ीस ख़ान

दीवार-ए-काबा 19 नवम्बर 1989

बिलाल अहमद

वो चुप था दीदा-ए-नम बोलते थे

भारत भूषण पन्त

दयार-ए-ज़ात में जब ख़ामुशी महसूस होती है

भारत भूषण पन्त

चाहतों के ख़्वाब की ताबीर थी बिल्कुल अलग

भारत भूषण पन्त

उदास काग़ज़ी मौसम में रंग ओ बू रख दे

बेकल उत्साही

ख़ोल चेहरों पे चढ़ाने नहीं आते हम को

बेदिल हैदरी

कहीं इंतिहा की मलामतें कहीं पत्थरों से अटी छतें

बेदिल हैदरी

ये जो चेहरों पे लिए गर्द-ए-अलम आते हैं

बेदिल हैदरी

मिरी दास्तान-ए-अलम तो सुन कोई ज़लज़ला नहीं आएगा

बेदिल हैदरी

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