शहर Poetry (page 66)

है अजीब शहर की ज़िंदगी न सफ़र रहा न क़याम है

बशीर बद्र

फ़लक से चाँद सितारों से जाम लेना है

बशीर बद्र

अच्छा तुम्हारे शहर का दस्तूर हो गया

बशीर बद्र

क्या बिछड़ कर रह गया जाने भरी बरसात में

बशीर मुंज़िर

हम बयाबानों में घूमे शहर की सड़कों पे टहले

बशीर मुंज़िर

होगा क्या चाँद-नगर सोचते हैं

बशीर मुंज़िर

दम-ब-ख़ुद है चाँदनी चुप-चाप हैं अश्जार भी

बशीर मुंज़िर

कैसी कैसी थीं उन्ही गलियों में ज़ेबा सूरतें

बशीर अहमद बशीर

हर गाम पे आवारगी-ओ-दर-ब-दरी में

बशीर अहमद बशीर

इक बे-सबात अक्स बना बे-निशाँ गया

बशीर अहमद बशीर

कोई सनम तो हो कोई अपना ख़ुदा तो हो

बशर नवाज़

वहशत में भी रुख़ जानिब-ए-सहरा न करेंगे

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

वो मक़ाम-ए-दिल-ओ-जाँ क्या होगा

बाक़ी सिद्दीक़ी

वफ़ा के ज़ख़्म हम धोने न पाए

बाक़ी सिद्दीक़ी

रंग-ए-दिल रंग-ए-नज़र याद आया

बाक़ी सिद्दीक़ी

ख़बर कुछ ऐसी उड़ाई किसी ने गाँव में

बाक़ी सिद्दीक़ी

दिल से बाहर हैं ख़रीदार अभी

बाक़ी सिद्दीक़ी

उदास बाम है दर काटने को आता है

बाक़ी अहमदपुरी

रोज़-ए-वहशत है मिरे शहर में वीरानी की

बाक़ी अहमदपुरी

मुझ से बिछड़ के वो भी परेशान था बहुत

बाक़ी अहमदपुरी

दश्त-ओ-दरिया के ये उस पार कहाँ तक जाती

बाक़ी अहमदपुरी

है दिल में घर को शहर से सहरा में ले चलें

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

है दिल में घर को शहर से सहरा में ले चलें

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

रखता है यूँ वो ज़ुल्फ़-ए-सियह-फ़ाम दोश पर

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

सुबुक-सरी में भी अंदेशा-ए-हवा रखना

बाक़र नक़वी

इस शहर में है कौन हमारा तिरे सिवा

बाक़र मेहदी

वो रिंद क्या कि जो पीते हैं बे-ख़ुदी के लिए

बाक़र मेहदी

हज़ार चाहा लगाएँ किसी से दिल लेकिन

बाक़र मेहदी

चाहा बहुत कि इश्क़ की फिर इब्तिदा न हो

बाक़र मेहदी

अश्क मेरे हैं मगर दीदा-ए-नम है उस का

बाक़र मेहदी

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