शहर Poetry (page 68)

उन्हें मुझ से शिकायत है

अज़रा नक़वी

मैं ने इक शहर हमेशा के लिए छोड़ दिया

अज़्म शाकरी

अपने दुख-दर्द का अफ़्साना बना लाया हूँ

अज़्म शाकरी

ख़राबी

अज़्म बहज़ाद

मैं ने कल ख़्वाब में आइंदा को चलते देखा

अज़्म बहज़ाद

मैं उम्र के रस्ते में चुप-चाप बिखर जाता

अज़्म बहज़ाद

बे-हद ग़म हैं जिन में अव्वल उम्र गुज़र जाने का ग़म

अज़्म बहज़ाद

समझ के रस्ता इधर से गुज़रने वालों ने

अज़लान शाह

कमाल ये है कि दुनिया को कुछ पता न लगे

अज़ीज़ुर्रहमान शहीद फ़तेहपुरी

मुझ से ये पूछ रहे हैं मिरे अहबाब 'अज़ीज़'

अज़ीज़ वारसी

सोज़िश-ए-ग़म के सिवा काहिश-ए-फ़ुर्क़त के सिवा

अज़ीज़ वारसी

ग़रीब शहर

अज़ीज़ क़ैसी

कंफ़ेशन

अज़ीज़ क़ैसी

अल्फ़-ए-लैला की आख़िरी सुब्ह

अज़ीज़ क़ैसी

उन्हें सवाल ही लगता है मेरा रोना भी

अज़ीज़ क़ैसी

उलझाओ का मज़ा भी तिरी बात ही में था

अज़ीज़ क़ैसी

मिटा के अंजुमन-ए-आरज़ू सदा दी है

अज़ीज़ क़ैसी

जितने थे रंग हुस्न-ए-बयाँ के बिगड़ गए

अज़ीज़ क़ैसी

तमाम शहर को तारीकियों से शिकवा है

अज़ीज़ नबील

किसी से ज़ेहन जो मिलता तो गुफ़्तुगू करते

अज़ीज़ नबील

वक़्त की आँख में सदियों की थकन है, मैं हूँ

अज़ीज़ नबील

सुनो मुसाफ़िर! सराए-जाँ को तुम्हारी यादें जला चुकी हैं

अज़ीज़ नबील

मोजज़े का दर खुला और इक असा रौशन हुआ

अज़ीज़ नबील

मिरा सवाल है ऐ क़ातिलान-ए-शब तुम से

अज़ीज़ नबील

मैं अपने गिर्द लकीरें बिछाए बैठा हूँ

अज़ीज़ नबील

इस बार हवाओं ने जो बेदाद-गरी की

अज़ीज़ नबील

अगरचे ज़ेहन के कश्कोल से छलक रहे थे

अज़ीज़ नबील

आएँगे नज़र सुब्ह के आसार में हम लोग

अज़ीज़ नबील

बनी हैं शहर-आशोब-ए-तमन्ना

अज़ीज़ लखनवी

ये मशवरा बहम उठ्ठे हैं चारा-जू करते

अज़ीज़ लखनवी

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