शहर Poetry (page 70)

इस को कोई ग़म नहीं है जिस का घर पत्थर का है

अज़हर नैयर

हुरूफ़ ख़ाली सदफ़ और निसाब ज़ख़्मों के

अज़हर नैयर

हमारे चेहरे पे रंज-ओ-मलाल ऐसा था

अज़हर नैयर

तुम्हारी याद के दीपक भी अब जलाना क्या

अज़हर इक़बाल

वो जिस के सेहन में कोई गुलाब खिल न सका

अज़हर इनायती

क्या रह गया है शहर में खंडरात के सिवा

अज़हर इनायती

चौराहों का तो हुस्न बढ़ा शहर के मगर

अज़हर इनायती

उदास उदास तबीअ'त जो थी बहलने लगी

अज़हर इनायती

तमाम शख़्सियत उस की हसीं नज़र आई

अज़हर इनायती

क़यामत आएगी माना ये हादिसा होगा

अज़हर इनायती

नज़र की ज़द में सर कोई नहीं है

अज़हर इनायती

मयस्सर हो जो लम्हा देखने को

अज़हर इनायती

मैं समुंदर था मुझे चैन से रहने न दिया

अज़हर इनायती

क्या क्या नवाह-ए-चश्म की रानाइयाँ गईं

अज़हर इनायती

कुछ आरज़ी उजाले बचाए हुए हैं लोग

अज़हर इनायती

किताबें जब कोई पढ़ता नहीं था

अज़हर इनायती

कभी क़रीब कभी दूर हो के रोते हैं

अज़हर इनायती

इस रास्ते में जब कोई साया न पाएगा

अज़हर इनायती

इस बार उन से मिल के जुदा हम जो हो गए

अज़हर इनायती

हर एक रात को महताब देखने के लिए

अज़हर इनायती

घर तो हमारा शो'लों के नर्ग़े में आ गया

अज़हर इनायती

घर का रस्ता जो भूल जाता हूँ

अज़हर इनायती

ग़मों से यूँ वो फ़रार इख़्तियार करता था

अज़हर इनायती

फ़न उड़ानों का जब ईजाद किया था मैं ने

अज़हर इनायती

दियों से आग जो लगती रही मकानों को

अज़हर इनायती

बनाए ज़ेहन परिंदों की ये क़तार मिरा

अज़हर इनायती

अपने आँचल में छुपा कर मिरे आँसू ले जा

अज़हर इनायती

ये कम नहीं के वही शाम का सितारा है

अज़हर हाश्मी

बस रंज की है दास्ताँ उन्वान हज़ारों

अज़हर हाश्मी

बहुत ग़नीमत हैं हम से मिलने कभी कभी के ये आने वाले

अज़हर फ़राग़

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