शहर Poetry (page 72)

लम्हों के अज़ाब सह रहा हूँ

अतहर नफ़ीस

क्या बात निराली है मुझ में किस फ़न में आख़िर यकता हूँ

अतहर नफ़ीस

फ़र्ज़ानों की इस बस्ती में एक अजब सौदाई है

अतहर नफ़ीस

दम-ब-दम बढ़ रही है ये कैसी सदा शहर वालो सुनो

अतहर नफ़ीस

किस दर्जा मिरे शहर की दिलकश है फ़ज़ा भी

अतहर नादिर

जिस को देखो वो गिरफ़्तार-ए-बला लगता है

अतीक़ मुज़फ़्फ़रपुरी

दिल के आँगन में तिरी याद का तारा चमका

अतीक़ अंज़र

मैं अपनी ख़ाक को जब आइना बनाता हूँ

अतीक़ अहमद

तिरी आँखों में इक मुबहम फ़साना ढूँढ ही लेगा

अताउर्रहमान जमील

कहाँ गए शब-ए-महताब के जमाल-ज़दा

अताउर्रहमान जमील

किसी और को मैं तिरे सिवा नहीं चाहता

अताउल हसन

मंज़िलें भी ये शिकस्ता-बाल-ओ पर भी देखना

अताउल हक़ क़ासमी

भटक रही है 'अता' ख़ल्क़-ए-बे-अमाँ फिर से

अताउल हक़ क़ासमी

भटक रही है 'अता' ख़ल्क़-ए-बे-अमाँ फिर से

अताउल हक़ क़ासमी

मैं ज़ख़्म ज़ख़्म रहूँ रूह के ख़राबों से

अता शाद

शहर-ए-निगार

असरार-उल-हक़ मजाज़

नज़्र-ए-अलीगढ़

असरार-उल-हक़ मजाज़

मुझे जाना है इक दिन

असरार-उल-हक़ मजाज़

ख़ाना-ब-दोश

असरार-उल-हक़ मजाज़

इलाहाबाद से

असरार-उल-हक़ मजाज़

आज भी

असरार-उल-हक़ मजाज़

आहंग-ए-नौ

असरार-उल-हक़ मजाज़

रुख़्सत ऐ हम-सफ़रो शहर-ए-निगार आ ही गया

असरार-उल-हक़ मजाज़

परतव-ए-साग़र-ए-सहबा क्या था

असरार-उल-हक़ मजाज़

बिजली हुई फ़ेल

असरार जामई

ज़िंदगी उलझी है बिखरे हुए गेसू की तरह

असरा रिज़वी

फिर कोई ताज़ा-सितम वो सितम-ईजाद करे

असरा रिज़वी

मैं तिरे शहर में फिरती रही मारी मारी

असरा रिज़वी

ऐसा ये दर्द है कि भुलाया न जाएगा

असरा रिज़वी

तू अपने शहर-ए-तरब से न पूछ हाल मिरा

असलम महमूद

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