शहर Poetry (page 71)

सुब्ह कैसी है वहाँ शाम की रंगत क्या है

अज़हर अदीब

सारे मंज़र में समाया हुआ लगता है मुझे

अज़हर अदीब

ऐ शहर-ए-सितम छोड़ के जाते हुए लोगो

अज़हर अदीब

सुब्ह कैसी है वहाँ शाम की रंगत क्या है

अज़हर अदीब

रौशनी हस्ब-ए-ज़रूरत भी नहीं माँगते हम

अज़हर अदीब

क्या तेरा क्या मेरा ख़्वाब

अज़हर अदीब

कल परदेस में याद आएगी ध्यान में रख

अज़हर अदीब

जगह फूलों की रखते हैं घना साया बनाते हैं

अज़हर अदीब

फ़ज़ा-ए-नीलगूँ का ध्यान छोड़ दे

अज़हर अब्बास

अपने वीराने का नुक़सान नहीं चाहता मैं

अज़हर अब्बास

ऐसे पामाल कि पहचान में आते ही नहीं

अज़हर अब्बास

इस से पहले कि घर के पर्दों से

आज़र अस्करी

वो रूह के गुम्बद में सदा बन के मिलेगा

आज़ाद गुलाटी

ये किस मक़ाम पे पहुँचा है कारवान-ए-वफ़ा

अय्यूब साबिर

रहगुज़ारों में रौशनी के लिए

अय्यूब रूमानी

ज़ब्त करना न कभी ज़ब्त में वहशत करना

अय्यूब ख़ावर

ख़ुश बहुत आते हैं मुझ को रास्ते दुश्वार से

औरंगज़ेब

मैं कि तुम पे बाज़ हूँ

अतीक़ुल्लाह

कितना मुश्किल है

अतीक़ुल्लाह

वो मेरे नाले का शोर ही था शब-ए-सियह की निहायतों में

अतीक़ुल्लाह

फ़रार के लिए जब रास्ता नहीं होगा

अतीक़ुल्लाह

आने वाला तो हर इक लम्हा गुज़र जाता है

अतीक़ुल्लाह

जीना है तो जीने का सहारा भी तो होगा

अतहर राज़

यक़ीन बरसों का इम्कान कुछ दिनों का हूँ

अतहर नासिक

यक़ीन बरसों का इम्कान कुछ दिनों का हूँ

अतहर नासिक

ख़ुद को किसी की राह-गुज़र किस लिए करें

अतहर नासिक

ख़ुद को किसी की राहगुज़र किस लिए करें

अतहर नासिक

तू मिला था और मेरे हाल पर रोया भी था

अतहर नफ़ीस

न शाम है न सवेरा अजब दयार में हूँ

अतहर नफ़ीस

न मंज़िल हूँ न मंज़िल-आश्ना हूँ

अतहर नफ़ीस

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