शहर Poetry (page 73)

पत्थरों पर वादियों में नक़्श-ए-पा मेरा भी है

असलम महमूद

ऐ मिरे ग़ुबार-ए-सर तू ही तो नहीं तन्हा राएगाँ तो मैं भी हूँ

असलम महमूद

जाने किस लम्हा-ए-वहशी की तलब है कि फ़लक

असलम कोलसरी

'असलम' बड़े वक़ार से डिग्री वसूल की

असलम कोलसरी

ज़लज़ले का ख़ौफ़ तारी है दर-ओ-दीवार पर

असलम कोलसरी

यार को दीदा-ए-ख़ूँ-बार से ओझल कर के

असलम कोलसरी

सीने में सुलगते हुए लम्हात का जंगल

असलम कोलसरी

रूठ कर निकला तो वो उस सम्त आया भी नहीं

असलम कोलसरी

रूठ कर निकला तो वो इस सम्त आया भी नहीं

असलम कोलसरी

जब भी हँसी की गर्द में चेहरा छुपा लिया

असलम कोलसरी

रफ़ीक़ दोस्त मुहिब मुझ को शाक़ सब ही थे

असलम हनीफ़

लुटी बहार का सूखा गुलाब रहने दो

असलम हबीब

किसी की याद का साया था या कि झोंका था

असलम हबीब

ज़द पे आ जाएगा जो कोई तो मर जाएगा

असलम फ़र्रुख़ी

हंगामा-ए-हस्ती से गुज़र क्यूँ नहीं जाते

असलम फ़र्रुख़ी

हवाएँ शहर की आलूदा-ए-कसाफ़त हैं

असलम इमादी

वो शब-ए-ग़म जो कम अँधेरी थी

असलम इमादी

तमाम खेल-तमाशों के दरमियान वही

असलम इमादी

कोशिश है गर उस की कि परेशान करेगा

असलम इमादी

ख़ुद अपनी चाल से ना-आश्ना रहे है कोई

असलम इमादी

न दश्त ओ दर से अलग था न जंगलों से जुदा

असलम आज़ाद

बस एक बार उसे रौशनी में देखा था

असलम आज़ाद

आँखों से मैं ने चख लिया मौसम के ज़हर को

असलम आज़ाद

ऐ ज़मिस्ताँ की हवा तेज़ न चल

असलम अंसारी

हर शख़्स इस हुजूम में तन्हा दिखाई दे

असलम अंसारी

अब और चलने का इस दिल में हौसला ही न था

असलम अंसारी

वक़्त बे-वक़्त ये पोशाक मिरी ताक में है

आसिम वास्ती

माना किसी ज़ालिम की हिमायत नहीं करते

आसिम वास्ती

होंटों को फूल आँख को बादा नहीं कहा

आसिम वास्ती

गुज़र चुका है जो लम्हा वो इर्तिक़ा में है

आसिम वास्ती

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