शहर Poetry (page 74)

दामन-ए-गुल में कहीं ख़ार छुपा देखते हैं

आसिम वास्ती

ज़मीं कहीं है मिरी और आसमान कहीं

अासिफ़ शफ़ी

उम्र सारी तिरी चाहत में बितानी पड़ जाए

अासिफ़ शफ़ी

जमाल-ए-यार को तस्वीर करने वाले थे

अासिफ़ शफ़ी

जहान-ए-हुस्न-ओ-नज़र से किनारा करना है

अासिफ़ शफ़ी

बसीत-ए-दश्त की हुर्मत को बाम-ओ-दर दे दे

अशरफ़ जावेद

तिरी नज़र के इशारे बदल भी सकते हैं

अशफ़ाक़ रशीद मंसूरी

दुनिया को हादसों में गिरफ़्तार देखना

अशफ़ाक़ रशीद मंसूरी

याद रक्खेगा मिरा कौन फ़साना मिरे दोस्त

अशफ़ाक़ नासिर

अगर ख़ुशी में तुझे गुनगुनाते लगते हैं

अशफ़ाक़ नासिर

इक पल में क्या कुछ बदल गया जब बे-ख़बरों को ख़बर हुई

अशफ़ाक़ आमिर

मैं ने भी परछाइयों के शहर की फिर राह ली

अशअर नजमी

रफ़्ता रफ़्ता ख़त्म क़िस्सा हो गया होना ही था

अशअर नजमी

शोर कैसा है मिरे दिल के ख़राबे से उठा

अशहर हाशमी

शहर में छाई हुई दीवार-ता-दीवार थी

अशहर हाशमी

क्या क़द्र-ए-अना होगी जबीं जान रही है

अशहर हाशमी

इक शहर ज़िया-बार यहाँ भी है वहाँ भी

अशहर हाशमी

ग़ुबार सा है सर-ए-शाख़-सार कहते हैं

असग़र सलीम

अभी कुछ दिन लगेंगे

असग़र नदीम सय्यद

जो इस ज़मीर फ़रोशी के माहेरीन में है

असग़र मेहदी होश

आए थे घर में आग लगाने शरीर लोग

असग़र मेहदी होश

पत्थर लिए हर मोड़ पे कुछ लोग खड़े हैं

असग़र गोरखपुरी

हम दश्त से हर शाम यही सोच के घर आए

असग़र गोरखपुरी

आँखों की नदी सूख गई फिर भी हरा है

असग़र गोरखपुरी

किस तरह आए तिरी बज़्म-ए-तरब में आइना

असीर लखनवी

सीनों में अगर होती कुछ प्यार की गुंजाइश

असद रज़ा

हम से दीवानों को असरी आगही डसती रही

असद रज़ा

शराब बंद हो साक़ी के बस की बात नहीं

असद मुल्तानी

रहें न रिंद ये ज़ाहिद के बस की बात नहीं

असद मुल्तानी

नौ मंज़िला बिल्डिंग

असद मोहम्मद ख़ाँ

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