शहर Poetry (page 76)

हैराँ हूँ कि ये कौन सा दस्तूर-ए-वफ़ा है

अर्श सिद्दीक़ी

दरवाज़ा तिरे शहर का वा चाहिए मुझ को

अर्श सिद्दीक़ी

बस एक ही कैफ़िय्यत-ए-दिल सुब्ह-ओ-मसा है

अर्श सिद्दीक़ी

आँखों में कहीं उस के भी तूफ़ाँ तो नहीं था

अर्श सिद्दीक़ी

मेरे प्यारे वतन

अर्श मलसियानी

जो गुम-गश्ता है उस की ज़ात क्या है

अरमान नज्मी

इक बे-निशान हर्फ़-ए-सदा की तरफ़ न देख

अरमान नज्मी

ये शहर है वो शहर कि जिस में हैं बे-वज्ह कामयाब चेहरे

अर्जुमंद बानो अफ़्शाँ

ग़रीब-ए-शहर तो फ़ाक़े से मर गया 'आरिफ़'

आरिफ़ शफ़ीक़

जो अपनी ख़्वाहिशों में तू ने कुछ कमी कर ली

आरिफ़ शफ़ीक़

हमें नज़दीक कब दिल की मोहब्बत खींच लाती है

आरिफ़ शफ़ीक़

वो मेरे शहर में आया हुआ है

आरिफ़ इशतियाक़

मैं अज़ल का राह-रौ मुझ को अबद की जुस्तुजू

आरिफ़ अब्दुल मतीन

बराए-नाम सही कोई मेहरबान तो है

अक़ील शादाब

क्या शहर में है गर्मी-ए-बाज़ार के सिवा

अनवर सिद्दीक़ी

डुबोए देता है ख़ुद-आगही का बार मुझे

अनवर सिद्दीक़ी

उस बज़्म में क्या कोई सुने राय हमारी

अनवर शऊर

टूटा तिलिस्म-ए-वक़्त तो क्या देखता हूँ मैं

अनवर शऊर

सुलैमान-ए-सुख़न तो ख़ैर क्या हूँ

अनवर शऊर

रही रात उन से मुलाक़ात कम

अनवर शऊर

कुछ दिनों अपने घर रहा हूँ मैं

अनवर शऊर

बुरा बुरे के अलावा भला भी होता है

अनवर शऊर

और न दर-ब-दर फिरा और न आज़मा मुझे

अनवर शऊर

ऐसे देखा है कि देखा ही न हो

अनवर शऊर

घुप-अँधेरे में भी उस का जिस्म था चाँदी का शहर

अनवर सदीद

नया शहर

अनवर सदीद

आरज़ू ने जिस की पोरों तक था सहलाया मुझे

अनवर सदीद

महफ़ूज़ रहेगा क्या एहसास का आईना

अनवर मीनाई

जब ज़मीं के मुक़द्दर सँवर जाएँगे

अनवर मीनाई

गुम कर दें इक ज़रा तुझे ख़्वाबों के शहर में

अनवर मीनाई

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