शहर Poetry (page 77)

बड़े सुकून से ख़ुद अपने हम-सरों में रहे

अनवर मीनाई

पढ़ने भी न पाए थे कि वो मिट भी गई थी

अनवर मसूद

मुझे ख़ुद से भी खटका सा लगा था

अनवर मसूद

कब ज़िया-बार तिरा चेहरा-ए-ज़ेबा होगा

अनवर मसूद

बस अब तर्क-ए-तअल्लुक़ के बहुत पहलू निकलते हैं

अनवर मसूद

हम से वफ़ा-शिआर को भी तेरे रू-ब-रू

अनवर जमाल अनवर

उस की सूरत उस की आँखें उस का चेहरा भूल गए

अनवार हबीब

खिला है फूल बहुत रोज़ में मुक़द्दर का

अनवर अंजुम

हुआ करे अगर उस को कोई गिला होगा

अनवर अंजुम

हुआ करे अगर उस को कोई गिला होगा

अनवर अंजुम

धूप हो गए साए जल गए शजर जैसे

अनवर अंजुम

आओ देखें अहल-ए-वफ़ा की होती है तौक़ीर कहाँ

अनवर मोअज़्ज़म

शहर-दर-शहर फ़ज़ाओं में धुआँ है अब के

अनवर महमूद खालिद

जिस दिन शहर जला था उस दिन धूप में कितनी तेज़ी थी

अंजुम तराज़ी

लम्हा लम्हा अपनी ज़हरीली बातों से डसता था

अंजुम तराज़ी

साथ बारिश में लिए फिरते हो उस को 'अंजुम'

अंजुम सलीमी

माज़रत रौंदे हुए फूलों से कर लूँ तो चलूँ

अंजुम सलीमी

इंहिराफ़

अंजुम सलीमी

गिर्या

अंजुम सलीमी

उम्र की सारी थकन लाद के घर जाता हूँ

अंजुम सलीमी

सख़्त मुश्किल में किया हिज्र ने आसान मुझे

अंजुम सलीमी

जाए ख़िरद नहीं है कि फ़रज़ाना चाहिए

अंजुम रूमानी

जब भी कोई बात की आँसू ढलके साथ

अंजुम रूमानी

दुखी दिलों के लिए ताज़ियाना रखता है

अंजुम रूमानी

तुम को भुला रही थी कि तुम याद आ गए

अंजुम रहबर

ज़िंदगी अपनी क़रीने से बसर होती नहीं

अंजुम नियाज़ी

हम सा दीवाना कहाँ मिल पाएगा इस दहर में

अंजुम लुधियानवी

मिरे मज़ार पे आ कर दिए जलाएगा

अंजुम ख़याली

ये कैसी बात मिरा मेहरबान भूल गया

अंजुम ख़लीक़

यहाँ जो ज़ख़्म मिलते हैं वो सिलते हैं यहीं मेरे

अंजुम ख़लीक़

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