शहर Poetry (page 78)

सदाक़तों को ये ज़िद है ज़बाँ तलाश करूँ

अंजुम ख़लीक़

पलकों तक आ के अश्क का सैलाब रह गया

अंजुम ख़लीक़

मिरे जुनूँ को हवस में शुमार कर लेगा

अंजुम ख़लीक़

कहाँ तक और इस दुनिया से डरते ही चले जाना

अंजुम ख़लीक़

अब शहर में अक़दार-कुशी एक हुनर है

अंजुम ख़लीक़

लहजे का रस हँसी की धनक छोड़ कर गया

अंजुम इरफ़ानी

वो जिस के नाम में लज़्ज़त बहुत है

अंजुम बाराबंकवी

किताब-ए-इश्क़ के जो मो'तबर रिसाले हैं

अंजुम बाराबंकवी

जो शब भर आँसुओं से तर रहेगा

अंजुम आज़मी

परछाइयों के शहर ज़मीं पर बसा दिए

अंजुम अंसारी

ज़माने भर का जो फ़ित्ना रहा था

अनजुम अब्बासी

ख़ामोशी का शहर

अनीस नागी

एक नज़्म

अनीस नागी

रू-ए-गुल चेहरा-ए-महताब नहीं देखते हैं

अनीस अशफ़ाक़

म'अरका जब छिड़ गया तो क्या हुआ हम से सुनो

अनीस अशफ़ाक़

कब इश्क़ में यारों की पज़ीराई हुई है

अनीस अशफ़ाक़

तुम्हारे शहर में इतने मकाँ गिरे कैसे

अनीस अंसारी

जहाँ दर था वहाँ दीवार क्यूँ है

अनीस अंसारी

इस शहर के लोग अजीब से हैं अब सब ही तुम्हारे असीर हुए

अनीस अंसारी

दिल पर यूँही चोट लगी तो कुछ दिन ख़ूब मलाल किया

अनीस अंसारी

देख कर हम को असीर-ए-आरज़ू

अमजद नजमी

सुना है कानों के कच्चे हो तुम बहुत सो हम

अमजद इस्लाम अमजद

हम-ज़ाद

अमजद इस्लाम अमजद

फ़ासले

अमजद इस्लाम अमजद

चश्म-ए-बे-ख़्वाब को सामान बहुत

अमजद इस्लाम अमजद

बुज़दिल

अमजद इस्लाम अमजद

तेरा ये लुत्फ़ किसी ज़ख़्म का उन्वान न हो

अमजद इस्लाम अमजद

रात मैं इस कश्मकश में एक पल सोया नहीं

अमजद इस्लाम अमजद

कान लगा कर सुनती रातें बातें करते दिन

अमजद इस्लाम अमजद

ग़ुबार-ए-दश्त-ए-तलब में हैं रफ़्तगाँ क्या क्या

अमजद इस्लाम अमजद

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