शहर Poetry (page 69)

दिल आया इस तरह आख़िर फ़रे‌‌‌‌ब-ए-साज़-ओ-सामाँ में

अज़ीज़ लखनवी

ऐसी कोई ख़बर तो नहीं साकिनान-ए-शहर

अज़ीज़ हामिद मदनी

वही दाग़-ए-लाला की बात है कि ब-नाम-ए-हुस्न उधर गई

अज़ीज़ हामिद मदनी

सलीब ओ दार के क़िस्से रक़म होते ही रहते हैं

अज़ीज़ हामिद मदनी

सब पेच-ओ-ताब-ए-शौक़ के तूफ़ान थम गए

अज़ीज़ हामिद मदनी

मिरी आँखें गवाह-ए-तल'अत-ए-आतिश हुईं जल कर

अज़ीज़ हामिद मदनी

लिखी हुई जो तबाही है उस से क्या जाता

अज़ीज़ हामिद मदनी

ख़त्म हुई शब-ए-वफ़ा ख़्वाब के सिलसिले गए

अज़ीज़ हामिद मदनी

जी-दारो! दोज़ख़ की हवा में किस की मोहब्बत जलती है

अज़ीज़ हामिद मदनी

हवा आशुफ़्ता-तर रखती है हम आशुफ़्ता-हालों को

अज़ीज़ हामिद मदनी

एक ही शहर में रहते बस्ते काले कोसों दूर रहा

अज़ीज़ हामिद मदनी

ऐ शहर-ए-ख़िरद की ताज़ा हवा वहशत का कोई इनआम चले

अज़ीज़ हामिद मदनी

ऐसी ख़्वाहिश को समझता हूँ मैं बिल्कुल नेचुरल

अज़ीज़ फ़ैसल

वक़्त हाकिम है किसी रोज़ दिला ही देगा

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

शहर ख़्वाबों का सुलगता रहा और शहर के लोग

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

वो ये कह कह के जलाता था हमेशा मुझ को

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

थकन से चूर हूँ लेकिन रवाँ-दवाँ हूँ मैं

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

लहू से उठ के घटाओं के दिल बरसते हैं

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

अलावा इक चुभन के क्या है ख़ुद से राब्ता मेरा

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

अंधेरा इतना है अब शहर के मुहाफ़िज़ को

अज़ीज अहमद ख़ाँ शफ़क़

यही नहीं कि नज़र को झुकाना पड़ता है

अज़ीज अहमद ख़ाँ शफ़क़

न जाने शाम ने क्या कह दिया सवेरे से

अज़हर नवाज़

मिलते जुलते हैं यहाँ लोग ज़रूरत के लिए

अज़हर नवाज़

उतर कर पानियों में चाँद महव-ए-रक़्स रहता है

अज़हर नक़वी

रह गया दीदा-ए-पुर-आब का सामाँ हो कर

अज़हर नक़वी

नहीं है पर कोई इम्कान हो भी सकता है

अज़हर नक़वी

एक इक साँस में सदियों का सफ़र काटते हैं

अज़हर नक़वी

दर-पेश नहीं नक़्ल-ए-मकानी कई दिन से

अज़हर नक़वी

सच बोलना चाहें भी तो बोला नहीं जाता

अज़हर नैयर

मैं अपने शहर में अपना ही चेहरा खो बैठा

अज़हर नैयर

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