शहर Poetry (page 67)

अजीब दिल में मिरे आज इज़्तिराब सा है!

बाक़र मेहदी

उम्र भर कुछ ख़्वाब दिल पर दस्तकें देते रहे

बक़ा बलूच

किरदार ही से ज़ीनत-ए-अफ़्लाक हो गए

बनो ताहिरा सईद

मैं, एक और मैं

बलराज कोमल

इत्तिफ़ाक़

बलराज कोमल

गिर्या-ए-सगाँ

बलराज कोमल

एक पुर-असरार सदा

बलराज कोमल

सदियों का कर्ब लम्हों के दिल में बसा दिया

बलराज हयात

उसी के ज़ुल्म से मैं हालत-ए-पनाह में था

बख़्श लाइलपूरी

समुंदर का तमाशा कर रहा हूँ

बख़्श लाइलपूरी

क़ातिल हुआ ख़मोश तो तलवार बोल उठी

बख़्श लाइलपूरी

जो पी रहा है सदा ख़ून बे-गुनाहों का

बख़्श लाइलपूरी

हुसूल-ए-मंज़िल-ए-जाँ का हुनर नहीं आया

बख़्श लाइलपूरी

दीदा-ए-बे-रंग में ख़ूँ-रंग मंज़र रख दिए

बख़्श लाइलपूरी

गई यक-ब-यक जो हवा पलट नहीं दिल को मेरे क़रार है

ज़फ़र

क़दमों से इतना दूर किनारा कभी न था

बद्र-ए-आलम ख़लिश

किस को फ़ुर्सत कौन पढ़ेगा चेहरे जैसा सच्चा सच

बद्र वास्ती

चराग़ों में अँधेरा है अँधेरे में उजाले हैं

बद्र वास्ती

टपकते शो'लों की बरसात में नहाउँगा

बदनाम नज़र

जो झुक के मिलते थे जलसों में मेहरबाँ की तरह

बदनाम नज़र

दिल-ओ-जाँ के फ़साने क्या हुए सब

बदनाम नज़र

रौशनी ही रौशनी है शहर में

बदीउज़्ज़माँ ख़ावर

मुझ को नहीं मालूम कि वो कौन है क्या है

बदीउज़्ज़माँ ख़ावर

महसूस हो रहा है जो ग़म मेरी ज़ात का

बदीउज़्ज़माँ ख़ावर

खड़ा था कौन कहाँ कुछ पता चला ही नहीं

बदीउज़्ज़माँ ख़ावर

कब बयाबाँ राह में आया ये समझा ही नहीं

बदीउज़्ज़माँ ख़ावर

है बहुत मुश्किल निकलना शहर के बाज़ार में

बदीउज़्ज़माँ ख़ावर

भागते सूरज को पीछे छोड़ कर जाएँगे हम

बदीउज़्ज़माँ ख़ावर

कुछ नहीं होता शब भर सोचों का सरमाया होता है

अज़रक़ अदीम

फ़ज़ा का रंग निखरता दिखाई देता है

अज़रा वहीद

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