वफ़ा Poetry (page 7)

फ़रेब-ए-राह-ए-मोहब्बत का आसरा भी नहीं

वहीदुल हसन हाश्मी

हर एक गाम पे सज्दा यहाँ रवा होगा

वहीदा नसीम

कोई न चाहने वाला था हुस्न-ए-रुस्वा का

वहीद क़ुरैशी

तुझ में तो एक ख़ू-ए-जफ़ा और हो गई

वहीद इलाहाबादी

परोमीथियस

वहीद अख़्तर

ज़बान-ए-ख़ल्क़ पे आया तो इक फ़साना हुआ

वहीद अख़्तर

रुख़्सत-ए-नुत्क़ ज़बानों को रिया क्या देगी

वहीद अख़्तर

लिपटी हुई फिरती है नसीम उन की क़बा से

वहीद अख़्तर

हम ने देखा है मोहब्बत का सज़ा हो जाना

वहीद अख़्तर

हम जो टूटे तो ग़म-ए-दहर का पैमाना बने

वहीद अख़्तर

हैं किस लिए उदास कोई पूछता नहीं

विश्वनाथ दर्द

कुछ लोग दिल की आड़ में रू-पोश हो गए

विश्मा ख़ान विश्मा

मैं इंसाँ था ख़ुदा होने से पहले

विशाल खुल्लर

लम्हा लम्हा शोर सा बरपा हुआ अच्छा लगा

विशाल खुल्लर

जीवन है पल पल की उलझन किस किस पल की बात करें

विलास पंडित मुसाफ़िर

मिरी वफ़ा की मुकम्मल तू दास्ताँ कर दे

विजय शर्मा अर्श

खोए हुए सहरा तक ऐ बाद-ए-सबा जाना

वारिस किरमानी

नई सहर है ये लोगो नया सवेरा है

वफ़ा मलिकपुरी

मुमकिन नहीं है अपने को रुस्वा वफ़ा करे

वफ़ा बराही

अँधेरी शब में चराग़-ए-रह-ए-वफ़ा देना

उषा भदोरिया

अक्सर तन्हाई से मिल कर रोए हैं

उषा भदोरिया

रफ़्ता रफ़्ता दिल-ए-बे-ताब ठहर जाएगा

उरूज ज़ैदी बदायूनी

मैं किस तरह तुझे इल्ज़ाम-ए-बेवफ़ाई दूँ

उनवान चिश्ती

वो मुस्कुरा के मोहब्बत से जब भी मिलते हैं

उनवान चिश्ती

रहने दे तकलीफ़-ए-तवज्जोह दिल को है आराम बहुत

उनवान चिश्ती

रात कई आवारा सपने आँखों में लहराए थे

उनवान चिश्ती

ब-ज़ाहिर गर्म है बाज़ार-ए-उल्फ़त

तिलोकचंद महरूम

ये किस से आज बरहम हो गई है

तिलोकचंद महरूम

वो आई शाम-ए-ग़म वक़्फ़-ए-बला होने का वक़्त आया

तिलोकचंद महरूम

ग़लत की हिज्र में हासिल मुझे क़रार नहीं

तिलोकचंद महरूम

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