याद Poetry (page 68)

उन की गोद में सर रख कर जब आँसू आँसू रोया था

बिमल कृष्ण अश्क

तुम्हारी याद का इक दायरा बनाती हूँ

बिल्क़ीस ख़ान

सोते में मुस्कुराते बच्चे को देख कर

बिलाल अहमद

नास्टैल्जिया

बिलाल अहमद

मुश्किल

बिलाल अहमद

दीवार-ए-काबा 19 नवम्बर 1989

बिलाल अहमद

धुँद

बिलाल अहमद

मिलती मुद्दत में है और पल में हँसी जाती है

भवेश दिलशाद

मसल सच है बशर की क़दर नेमत ब'अद होती है

भारतेंदु हरिश्चंद्र

ख़याल-ए-नावक-ए-मिज़्गाँ में बस हम सर पटकते हैं

भारतेंदु हरिश्चंद्र

ग़ज़ब है सुर्मा दे कर आज वो बाहर निकलते हैं

भारतेंदु हरिश्चंद्र

बाल बिखेरे आज परी तुर्बत पर मेरे आएगी

भारतेंदु हरिश्चंद्र

असीरान-ए-क़फ़स सेहन-ए-चमन को याद करते हैं

भारतेंदु हरिश्चंद्र

पराया लग रहा था जो वही अपना निकल आया

भारत भूषण पन्त

कहीं जैसे मैं कोई चीज़ रख कर भूल जाता हूँ

भारत भूषण पन्त

कब तक गर्दिश में रहना है कुछ तो बता अय्याम मुझे

भारत भूषण पन्त

दीद की तमन्ना में आँख भर के रोए थे

भारत भूषण पन्त

तुम्हारी याद मेरा दिल ये दिनों चलते पुर्ज़े हैं

बेख़ुद देहलवी

हमें इस्लाम उसे इतना तअल्लुक़ है अभी बाक़ी

बेख़ुद देहलवी

दिल तो लेते हो मगर ये भी रहे याद तुम्हें

बेख़ुद देहलवी

दी क़सम वस्ल में उस बुत को ख़ुदा की तो कहा

बेख़ुद देहलवी

आप शर्मा के न फ़रमाएँ हमें याद नहीं

बेख़ुद देहलवी

न क्यूँ-कर नज़्र दिल होता न क्यूँ-कर दम मिरा जाता

बेख़ुद देहलवी

दे मोहब्बत तो मोहब्बत में असर पैदा कर

बेख़ुद देहलवी

बेताब रहें हिज्र में कुछ दिल तो नहीं हम

बेख़ुद देहलवी

अब किसी बात का तालिब दिल-ए-नाशाद नहीं

बेख़ुद देहलवी

जिस में सौदा नहीं वो सर ही नहीं

बेखुद बदायुनी

मुझ को शिकस्तगी का क़लक़ देर तक रहा

बेकल उत्साही

तुम याद मुझे आ जाते हो

बहज़ाद लखनवी

ऐ जज़्बा-ए-दिल गर मैं चाहूँ हर चीज़ मुक़ाबिल आ जाए

बहज़ाद लखनवी

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