याद Poetry (page 70)

मिरी ज़िंदगी भी मिरी नहीं ये हज़ार ख़ानों में बट गई

बशीर बद्र

मैं कब तन्हा हुआ था याद होगा

बशीर बद्र

किसी की याद में पलकें ज़रा भिगो लेते

बशीर बद्र

कहीं चाँद राहों में खो गया कहीं चाँदनी भी भटक गई

बशीर बद्र

जब रात की तन्हाई दिल बन के धड़कती है

बशीर बद्र

होंटों पे मोहब्बत के फ़साने नहीं आते

बशीर बद्र

भीगी हुई आँखों का ये मंज़र न मिलेगा

बशीर बद्र

क़र्या क़र्या ख़ाक उड़ाई कूचा-गर्द फ़क़ीर हुए

बशीर अहमद बशीर

कैसी कैसी थीं उन्ही गलियों में ज़ेबा सूरतें

बशीर अहमद बशीर

करोगे याद तो हर बात याद आएगी

बशर नवाज़

अज़ल-ता-अबद

बशर नवाज़

ये हुस्न है झरनों में न है बाद-ए-चमन में

बशर नवाज़

जब छाई घटा लहराई धनक इक हुस्न-ए-मुकम्मल याद आया

बशर नवाज़

बहुत था ख़ौफ़ जिस का फिर वही क़िस्सा निकल आया

बशर नवाज़

मतलब न काबे से न इरादा कनिश्त का

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

देखी जो ज़ुल्फ़-ए-यार तबीअत सँभल गई

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

चाँद सा चेहरा जो उस का आश्कारा हो गया

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

हर याद हर ख़याल है लफ़्ज़ों का सिलसिला

बाक़ी सिद्दीक़ी

वो मक़ाम-ए-दिल-ओ-जाँ क्या होगा

बाक़ी सिद्दीक़ी

तारे दर्द के झोंके बन कर आते हैं

बाक़ी सिद्दीक़ी

रंग-ए-दिल रंग-ए-नज़र याद आया

बाक़ी सिद्दीक़ी

कहता है हर मकीं से मकाँ बोलते रहो

बाक़ी सिद्दीक़ी

हम ज़र्रे हैं ख़ाक-ए-रहगुज़र के

बाक़ी सिद्दीक़ी

दाग़-ए-दिल हम को याद आने लगे

बाक़ी सिद्दीक़ी

सीखा जो क़लम से न-ए-ख़ाली का बजाना

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

कभी तो याद के गुल-दान में सजाऊँ उसे

बाक़र नक़वी

कभी तो भूल गए पी के नाम तक उन का

बाक़र मेहदी

सज़ा

बाक़र मेहदी

नई जुस्तुजू का अलमिया

बाक़र मेहदी

मेरा जनम दिन

बाक़र मेहदी

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