याद Poetry (page 69)

शादी ओ अलम सब से हासिल है सुबुकदोशी

बेदम शाह वारसी

न कुनिश्त ओ कलीसा से काम हमें दर-ए-दैर न बैत-ए-हरम से ग़रज़

बेदम शाह वारसी

मुझ से छुप कर मिरे अरमानों को बर्बाद न कर

बेदम शाह वारसी

मुझे शिकवा नहीं बर्बाद रख बर्बाद रहने दे

बेदम शाह वारसी

मुझे जल्वों की उस के तमीज़ हो क्या मेरे होश-ओ-हवास बचा ही नहीं

बेदम शाह वारसी

में ग़श में हूँ मुझे इतना नहीं होश

बेदम शाह वारसी

कभी यहाँ लिए हुए कभी वहाँ लिए हुए

बेदम शाह वारसी

बुत भी इस में रहते थे दिल यार का भी काशाना था

बेदम शाह वारसी

बताए देती है बे-पूछे राज़ सब दिल के

बेदम शाह वारसी

अपने दीदार की हसरत में तू मुझ को सरापा दिल कर दे

बेदम शाह वारसी

हक़-केश की फ़रियाद

बेबाक भोजपुरी

अहसन तक़्वीम

बेबाक भोजपुरी

सुब्ह क़यामत आएगी कोई न कह सका कि यूँ

बयान मेरठी

इश्वा है नाज़ है ग़म्ज़ा है अदा है क्या है

बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान

मोहब्बत की इंतिहा चाहता हूँ

बासित भोपाली

मेरे रोने पर किसी की चश्म गिर्यां हाए हाए

बासित भोपाली

इश्क़-ए-सितम-परस्त क्या हुस्न-ए-सितम-शिआ'र क्या

बासित भोपाली

कैसे याद रही तुझ को

बासिर सुल्तान काज़मी

था जो कभी इक शौक़-ए-फ़ुज़ूल

बासिर सुल्तान काज़मी

ख़त में क्या क्या लिखूँ याद आती है हर बात पे बात

बासिर सुल्तान काज़मी

किस मस्ती में अब रहता हूँ

बशीर महताब

इक लम्हा भी गुज़ारूँ भला क्यूँ किसी के साथ

बशीर महताब

आज-कल के शबाब देखे हैं

बशीर महताब

मैं जितनी देर तिरी याद में उदास रहा

बशीर फ़ारूक़ी

मिरी नमाज़ मिरी बंदगी मिरा ईमाँ

बशीर फ़ारूक़

यारो नए मौसम ने ये एहसान किए हैं

बशीर बद्र

फिर याद बहुत आएगी ज़ुल्फ़ों की घनी शाम

बशीर बद्र

लोबान में चिंगारी जैसे कोई रख जाए

बशीर बद्र

बिछी थीं हर तरफ़ आँखें ही आँखें

बशीर बद्र

तारों भरी पलकों की बरसाई हुई ग़ज़लें

बशीर बद्र

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