याद Poetry (page 74)

कुछ भी हो मिरा हाल नुमायाँ तो नहीं है

अज़ीम मुर्तज़ा

फ़ुग़ाँ से तर्क-ए-फ़ुग़ाँ तक हज़ार तिश्ना-लबी है

अज़ीम मुर्तज़ा

आज आईने में ख़ुद को देख कर याद आ गया

आज़ाद गुलाटी

तुम्हारे पास रहें हम तो मौत भी क्या है

आज़ाद गुलाटी

फिर इस के बा'द का कोई न हो गुज़र मुझ में

आज़ाद गुलाटी

मैं अपने आप से इक खेल करने वाला हूँ

आज़ाद गुलाटी

हर इक शिकस्त को ऐ काश इस तरह मैं सहूँ

आज़ाद गुलाटी

आने वाले हादसों के ख़ौफ़ से सहमे हुए

आज़ाद गुलाटी

तिलिस्म-ए-इस्म-ए-मोहब्बत है दरपय-ए-दर-ए-दिल

अय्यूब ख़ावर

इक तुम कि हो बे-ख़बर सदा के

अय्यूब ख़ावर

चराग़-ए-क़ुर्ब की लौ से पिघल गया वो भी

अय्यूब ख़ावर

बुझने लगे नज़र तो फिर उस पार देखना

अय्यूब ख़ावर

आ कर उरूज कैसे गिरा है ज़वाल पर

औरंगज़ेब

गह मश्क़-ए-सितम गाह-ए-करम याद करेंगे

औलाद अली रिज़वी

कितना मुश्किल है

अतीक़ुल्लाह

वो तवानाई कहाँ जो कल तलक आज़ा में थी

अतीक़ुल्लाह

दुनिया से हुए बैठे हो रू-पोश ऐ जाना

आतिफ़ ख़ान

यूँ तसव्वुर में दबे पाँव तिरी याद आई

अतहर राज़

मुसव्विर का हाथ

अतहर राज़

ग़म के बादल दिल-ए-नाशाद पे ऐसे छाए

अतहर राज़

ख़ुद को किसी की राह-गुज़र किस लिए करें

अतहर नासिक

जी न सकूँ मैं जिस के बग़ैर

अतहर नफ़ीस

साया मेरा साया वो

अतहर नफ़ीस

क्या बात निराली है मुझ में किस फ़न में आख़िर यकता हूँ

अतहर नफ़ीस

करता मैं अब किसी से कोई इल्तिमास क्या

अतहर नादिर

अपनी बेटी के नाम

अतीया दाऊद

दूर मुझ से रहते हैं सारे ग़म ज़माने के

अतीक़ अंज़र

जिस्म के घरौंदे में आग शोर करती है

अतीक़ अंज़र

दिल के आँगन में तिरी याद का तारा चमका

अतीक़ अंज़र

वक़्त ने लूटे हैं हस्ती के ख़ज़ाने कितने

अतीब एजाज़

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