याद Poetry (page 86)

उन को बुलाएँ और वो न आएँ तो क्या करें

अख़्तर शीरानी

निकहत-ए-ज़ुल्फ़ से नींदों को बसा दे आ कर

अख़्तर शीरानी

मैं आरज़ू-ए-जाँ लिखूँ या जान-ए-आरज़ू!

अख़्तर शीरानी

काम आ सकीं न अपनी वफ़ाएँ तो क्या करें

अख़्तर शीरानी

झूम कर बदली उठी और छा गई

अख़्तर शीरानी

हर एक जल्वा-ए-रंगीं मिरी निगाह में है

अख़्तर शीरानी

अश्क-बारी न मिटी सीना-फ़िगारी न गई

अख़्तर शीरानी

आश्ना हो कर तग़ाफ़ुल आश्ना क्यूँ हो गए

अख़्तर शीरानी

आरज़ू वस्ल की रखती है परेशाँ क्या क्या

अख़्तर शीरानी

आओ बे-पर्दा तुम्हें जल्वा-ए-पिन्हाँ की क़सम

अख़्तर शीरानी

ये बे-सबब नहीं आए हैं आँख में आँसू

अख़्तर सईद ख़ान

तुम हो या छेड़ती है याद-ए-सहर कोई तो है

अख़्तर सईद ख़ान

तिरी जबीं पे मिरी सुब्ह का सितारा है

अख़्तर सईद ख़ान

सफ़र ही शर्त-ए-सफ़र है तो ख़त्म क्या होगा

अख़्तर सईद ख़ान

सन्नाटा

अख़्तर राही

घरौंदे

अख़्तर पयामी

थीं तुम्हारी जिस पे नवाज़िशें कभी तुम भी जिस पे थे मेहरबाँ

अख़तर मुस्लिमी

सुन के रूदाद-ए-अलम मेरी वो हँस कर बोले

अख़तर मुस्लिमी

माइल-ए-लुत्फ़ है आमादा-ए-बे-दाद भी है

अख़तर मुस्लिमी

किस को कहते हैं जफ़ा क्या है वफ़ा याद नहीं

अख़तर मुस्लिमी

दिल में टीसें जाग उठती हैं पहलू बदलते वक़्त बहुत

अख्तर लख़नवी

अब भी आती है तिरी याद प इस कर्ब के साथ

अख़तर इमाम रिज़वी

जो संग हो के मुलाएम है सादगी की तरह

अख़तर इमाम रिज़वी

दिल वो प्यासा है कि दरिया का तमाशा देखे

अख़तर इमाम रिज़वी

रुख़्सत-ए-रक़्स भी है पाँव में ज़ंजीर भी है

अख़्तर होशियारपुरी

ये हसीन फ़ितरत के हुस्न का अनीला-पन

अख़्तर अंसारी

सुना के अपने ऐश-ए-ताम की रूदाद के टुकड़े

अख़्तर अंसारी

शोले भड़काओ देखते क्या हो

अख़्तर अंसारी

शोले भड़काओ देखते क्या हो

अख़्तर अंसारी

साफ़ ज़ाहिर है निगाहों से कि हम मरते हैं

अख़्तर अंसारी

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