ज़बां Poetry (page 27)

अभी बादलों का सफ़र कहाँ मिरे मेहरबाँ

बुशरा हाश्मी

रह-रव-ए-राह-ए-मोहब्बत कौन सी मंज़िल में है

बिस्मिल सईदी

हैराँ हूँ कि अब लाऊँ कहाँ से मैं ज़बाँ और

बिस्मिल साबरी

जो न करना था किया जो कुछ न होना था हुआ

बिस्मिल इलाहाबादी

नाम उस का

बिमल कृष्ण अश्क

कब इक मक़ाम पे रुकती है सर-फिरी है हवा

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

नास्टैल्जिया

बिलाल अहमद

फ़साद-ए-दुनिया मिटा चुके हैं हुसूल-ए-हस्ती मिटा चुके हैं

भारतेंदु हरिश्चंद्र

अक़्ल दौड़ाई बहुत कुछ तो गुमाँ तक पहुँचे

बेताब अज़ीमाबादी

शौक़ अपना आप मैं अपनी ज़बाँ से क्यूँ कहूँ

बेख़ुद देहलवी

बेवफ़ा कहने से क्या वो बेवफ़ा हो जाएगा

बेख़ुद देहलवी

क्यूँ मिरा हाल क़िस्सा-ख़्वाँ से सुनो

बेखुद बदायुनी

क़स्र-ए-जानाँ तक रसाई हो किसी तदबीर से

बेदम शाह वारसी

दिल लिया जान ली नहीं जाती

बेदम शाह वारसी

ग़म्ज़ा-ए-मा'शूक़ मुश्ताक़ों को दिखलाती है तेग़

बयान मेरठी

रात उस तुनुक-मिज़ाज से कुछ बात बढ़ गई

बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान

जैसे भी ये दुनिया है जो कुछ भी ज़माना है

बासित भोपाली

पूछते हैं वो इश्क़ का मतलब

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

है दुनिया में ज़बाँ मेरी अगर बंद

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

भूला-बिसरा ख़्वाब हुए हम

बशीर सैफ़ी

सब की मौजूदगी समझता है

बशीर महताब

ये चराग़ बे-नज़र है ये सितारा बे-ज़बाँ है

बशीर बद्र

वो ग़ज़ल वालों का उस्लूब समझते होंगे

बशीर बद्र

वही ताज है वही तख़्त है वही ज़हर है वही जाम है

बशीर बद्र

मिरी ज़बाँ पे नए ज़ाइक़ों के फल लिख दे

बशीर बद्र

न कोई उन के सिवा और जान-ए-जाँ देखा

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

हिन्द के जाँ-बाज़ सिपाही

बर्क़ देहलवी

कहता है हर मकीं से मकाँ बोलते रहो

बाक़ी सिद्दीक़ी

हम कहाँ आइना ले कर आए

बाक़ी सिद्दीक़ी

क़लम सिफ़त में पस-अज़-मरातिब बदन सना में तिरी खपाया

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

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