ज़बां Poetry (page 26)

नवेद-ए-यौम-ए-बहाराँ ख़िज़ाँ से ज़ाहिर हो

एजाज़ अासिफ़

बे-नियाज़-ए-सौत-ओ-महरूम-ए-बयाँ रक्खा गया

एजाज़ अासिफ़

तुम अच्छे मसीहा हो दवा क्यूँ नहीं देते

एहसान जाफ़री

जज़्बात की शिद्दत से निखरता है बयाँ और

एहसान जाफ़री

किस किस की ज़बाँ रोकने जाऊँ तिरी ख़ातिर

एहसान दानिश

है निगाहों में कोह-ए-तूर मियाँ

डॉक्टर आज़म

शदीद गरमी के मौसम में मुशाइरा

दिलावर फ़िगार

किसी क़लम से किसी की ज़बाँ से चलता हूँ

धीरेंद्र सिंह फ़य्याज़

लुत्फ़ हो हश्र में कुछ बात बनाए न बने

दत्तात्रिया कैफ़ी

रक़्स करती है फ़ज़ा वज्द में जाम आया है

दर्शन सिंह

राज़-ए-निहाँ थी ज़िंदगी राज़-ए-निहाँ है आज भी

दर्शन सिंह

कब ख़मोशी को मोहब्बत की ज़बाँ समझा था मैं

दर्शन सिंह

सितम के बा'द भी बाक़ी करम की आस तो है

दानिश फ़राही

उर्दू है जिस का नाम हमीं जानते हैं 'दाग़'

दाग़ देहलवी

नहीं खेल ऐ 'दाग़' यारों से कह दो

दाग़ देहलवी

बे-ज़बानी ज़बाँ न हो जाए

दाग़ देहलवी

ये बात बात में क्या नाज़ुकी निकलती है

दाग़ देहलवी

उज़्र उन की ज़बान से निकला

दाग़ देहलवी

पुकारती है ख़मोशी मिरी फ़ुग़ाँ की तरह

दाग़ देहलवी

फिरे राह से वो यहाँ आते आते

दाग़ देहलवी

मुझ सा न दे ज़माने को परवरदिगार दिल

दाग़ देहलवी

काबे की है हवस कभी कू-ए-बुताँ की है

दाग़ देहलवी

जल्वे मिरी निगाह में कौन-ओ-मकाँ के हैं

दाग़ देहलवी

बाब-ए-रहमत पे दुआ गिर्या-कुनाँ हो जैसे

दाएम ग़व्वासी

लाख कुछ न हम कहते बे-ज़बाँ रहे होते

चरण सिंह बशर

मर्सिया गोपाल कृष्ण गोखले

चकबस्त ब्रिज नारायण

हुब्ब-ए-क़ौमी

चकबस्त ब्रिज नारायण

नए झगड़े निराली काविशें ईजाद करते हैं

चकबस्त ब्रिज नारायण

कभी था नाज़ ज़माने को अपने हिन्द पे भी

चकबस्त ब्रिज नारायण

वही लफ़्ज़ हैं दुर्र-ए-बे-बहा मिरे वास्ते

बुशरा हाश्मी

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