ज़बां Poetry (page 29)

शहर को आतिश-ए-रंजिश के धुआँ तक देखूँ

अज़हर हाश्मी

ख़ामोश ज़बाँ से जब तक़रीर निकलती है

अज़हर हाश्मी

कभी मधुर कभी मीठी ज़बाँ का शाइ'र हूँ

अज़हर हाश्मी

हमेशा वाहिद-ए-यकता बयाँ से गुज़रा है

अज़हर हाश्मी

किस ने कहा कि चुप हूँ मियाँ बोलता नहीं

अज़हर अब्बास

रौशनी फैली तो सब का रंग काला हो गया

आज़ाद गुलाटी

लम्हा लम्हा इक नई सई-ए-बक़ा करती हुई

आज़ाद गुलाटी

अपनी सारी काविशों को राएगाँ मैं ने किया

आज़ाद गुलाटी

जो तकब्बुर से भटकती है ज़बाँ

आतिफ़ ख़ान

वो दौर क़रीब आ रहा है

अतहर नफ़ीस

अल्फ़ाज़ न दे पाएँ अगर साथ बयाँ का

अतीक़ मुज़फ़्फ़रपुरी

फ़ाख़्ता शाख़ से उड़ते हुए घबराई थी

अताउल हसन

भटक रही है 'अता' ख़ल्क़-ए-बे-अमाँ फिर से

अताउल हक़ क़ासमी

भटक रही है 'अता' ख़ल्क़-ए-बे-अमाँ फिर से

अताउल हक़ क़ासमी

आज भी 'प्रेम' के और 'कृष्ण' के अफ़्साने हैं

अता आबिदी

हम अर्ज़-ए-वफ़ा भी कर न सके कुछ कह न सके कुछ सुन न सके

असरार-उल-हक़ मजाज़

सरमाया-दारी

असरार-उल-हक़ मजाज़

इंक़लाब

असरार-उल-हक़ मजाज़

तस्कीन-ए-दिल-ए-महज़ूँ न हुई वो सई-ए-करम फ़रमा भी गए

असरार-उल-हक़ मजाज़

सीने में उन के जल्वे छुपाए हुए तो हैं

असरार-उल-हक़ मजाज़

हमारी जीत हुई है कि दोनों हारे हैं

असलम कोलसरी

किश्त-ए-दिल वीराँ सही तुख़्म-ए-हवस बोया नहीं

असलम आज़ाद

क्या फ़ाश करूँ ग़म-ए-निहाँ को

आसिफ़ुद्दौला

तज़लील

आसिफ़ रज़ा

थीं ज़मीनें गुम-शुदा और आसमाँ मिलता न था

अशरफ़ शाद

बस-कि दीदार तिरा जल्वा-ए-क़ुद्दूसी है

अशरफ़ अली फ़ुग़ाँ

जो गुज़रती है कहा करता हूँ

अशोक साहनी साहिल

इस को ग़ुरूर-ए-इश्क़ ने क्या क्या बना दिया

अशोक साहनी

विरासत

अशोक लाल

बात में बात उसी की है सुनो तुम जिस की

अश्क रामपुरी

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