क्या फ़ाश करूँ ग़म-ए-निहाँ को

क्या फ़ाश करूँ ग़म-ए-निहाँ को

पायाँ नहीं मेरी दास्ताँ को

क़िस्से को न पूछो मेरे हरगिज़

यारा ही नहीं दिल-ओ-ज़बाँ को

दरपय हैं नसीहतों के यारब

समझाऊँ मैं क्यूँ के दोस्ताँ को

गो हम ने सिलाया जेब-ओ-दामाँ

क्या कीजिएगा चश्म-ए-ख़ूँ-फ़िशाँ को

हो गर न वो शम्अ'-रू ही तो फिर

क्या आग लगाऊँ दूद-माँ को

गुज़रा था उधर से कल जो शायद

आया था वो मेरे इम्तिहाँ को

आए तो अभी थे मेरे साहब

ऐसी जल्दी चले कहाँ को

ऐ यारो समझ के बोलो उस बिन

मैं जाऊँगा बाग़-ओ-बोस्ताँ को

'आसिफ़' अभी मैं ने क्या कहा था

टुक बंद नहीं तिरी ज़बाँ को

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