ज़बां Poetry (page 30)

सर्द-मेहरी से तिरी दिल जो तपाँ रखते हैं

अश्क रामपुरी

कश्मकश में हैं तिरी ज़ुल्फ़ों के ज़िंदानी हनूज़

अश्क अमृतसरी

ज़र्द पत्तों पे मिरा नाम लिखा है उस ने

अशफ़ाक़ अंजुम

इतना बे-नफ़अ नहीं उस से बिछड़ना मेरा

अशफ़ाक़ हुसैन

ना-तमामी के शरर में रोज़ ओ शब जलते रहे

अशअर नजमी

इस सफ़र में नीम-जाँ मैं भी नहीं तू भी नहीं

अशअर नजमी

इंकिशाफ़-ए-ज़ात के आगे धुआँ है और बस

अशअर नजमी

आने वाले दौर में जो पाएगा पैग़म्बरी

असग़र मेहदी होश

तिरे जल्वों के आगे हिम्मत-ए-शरह-ओ-बयाँ रख दी

असग़र गोंडवी

रुमूज़-ए-मोहब्बत

असर सहबाई

सना तेरी नहीं मुमकिन ज़बाँ से

असर लखनवी

तमाशा है कि सब आज़ाद क़ौमें

असद मुल्तानी

हम-साई

असद जाफ़री

सिर्फ़ कहने को कोई अज़्मत-निशाँ बनता नहीं

असद जाफ़री

बड़े नादान थे हम रेत को आब-ए-रवाँ समझे

असअ'द बदायुनी

मिसाल-ए-शम्अ अपनी आग में क्या आप जल जाऊँ

आरज़ू लखनवी

ये दास्तान-ए-दिल है क्या हो अदा ज़बाँ से

आरज़ू लखनवी

वो बन कर बे-ज़बाँ लेने को बैठे हैं ज़बाँ मुझ से

आरज़ू लखनवी

वअ'दा सच्चा है कि झूटा मुझे मालूम न था

आरज़ू लखनवी

तुम्हें क्या काम नालों से तुम्हें क्या काम आहों से

आरज़ू लखनवी

तलाश-ए-रंग में आवारा मिस्ल-ए-बू हूँ मैं

आरज़ू लखनवी

किसी गुमान-ओ-यक़ीं की हद में वो शोख़-ए-पर्दा-नशीं नहीं है

आरज़ू लखनवी

करम उन का ख़ुद है बढ़ कर मिरी हद्द-ए-इल्तिजा से

आरज़ू लखनवी

हुस्न से शरह हुई इश्क़ के अफ़्साने की

आरज़ू लखनवी

हम आज खाएँगे इक तीर इम्तिहाँ के लिए

आरज़ू लखनवी

दम-ब-ख़ुद बैठ के ख़ुद जैसे ज़बाँ गीली है

आरज़ू लखनवी

चोट दिल पर लगे और आह ज़बाँ से निकले

अरुण कुमार आर्य

हर एक लम्हा-ए-ग़म बहर-ए-बे-कराँ की तरह

अरशद कमाल

ये जी में आता है जल जल के हर ज़माँ नासेह

अरशद अली ख़ान क़लक़

मिलता है क़ैद-ए-ग़म में भी लुत्फ़-ए-फ़ज़ा-ए-बाग़

अरशद अली ख़ान क़लक़

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