जीवन Poetry (page 16)

ज़िंदगी जिस ने तल्ख़ की मेरी

सुहैल अख़्तर

तमन्ना दिल में घर करती बहुत है

सुहैल अहमद ज़ैदी

सफ़र में अब भी आदतन सराब देखता हूँ मैं

सुहैल अहमद ज़ैदी

मैं खो गया तो शहर-ए-फ़न में दस्तियाब हो गया

सुहैल अहमद ज़ैदी

इसी मामूल-ए-रोज़-ओ-शब में जी का दूसरा होना

सुहैल अहमद ज़ैदी

जो कुछ हुआ सो हुआ अब सवाल ही क्या है

सुहा मुजद्ददी

कब तक भँवर के बीच सहारा मिले मुझे

सुग़रा सदफ़

शाम-ए-फ़िराक़ अपनी फ़रोज़ाँ न कर सके

सुग़रा सब्ज़वारी

तिरी याद जो मेरे दिल में है बस उसी की जल्वागरी रही

सूफ़िया अनजुम ताज

ये आज आए हैं किस अजनबी से देस में हम

सूफ़ी तबस्सुम

वो वुसअतें थीं दिल में जो चाहा बना लिया

सूफ़ी तबस्सुम

वो थे पहलू में और थी चाँदनी रात

सूफ़ी तबस्सुम

वो हुस्न को जल्वा-गर करेंगे

सूफ़ी तबस्सुम

वो हुस्न को जल्वा-गर करेंगे

सूफ़ी तबस्सुम

सायों से लिपट रहे थे साए

सूफ़ी तबस्सुम

नज़रों से ग़ुबार छट गए हैं

सूफ़ी तबस्सुम

नाला-ए-सबा तन्हा फूल की हँसी तन्हा

सूफ़ी तबस्सुम

मिटी मिटी हुई यादों के दाग़ क्या जलते?

सूफ़ी तबस्सुम

हज़ार गर्दिश-ए-शाम-ओ-सहर से गुज़रे हैं

सूफ़ी तबस्सुम

दास्तान-ए-ग़म हम ने कह भी दी तो क्या होगा

सूफ़ी तबस्सुम

बुझी बुझी सी सितारों की रौशनी है अभी

सूफ़ी तबस्सुम

अगरचे आँख बहुत शोख़ियों की ज़द में रही

सूफ़ी तबस्सुम

अफ़्साना-हा-ए-दर्द सुनाते चले गए

सूफ़ी तबस्सुम

शायद मैं ज़िंदगी की सहर ले के आ गया

सुदर्शन फ़ाकिर

अगर हम कहें और वो मुस्कुरा दें

सुदर्शन फ़ाकिर

मैं जुदाई का मुक़र्रर सिलसिला हो जाऊँगा

सुबोध लाल साक़ी

बढ़ा जो दर्द-ए-जिगर ग़म से दोस्ती कर ली

सुभाष पाठक ज़िया

मैं यूँ तो ख़्वाब की ताबीर सोचता भी नहीं

सुबहान असद

कभी जुदा दो बदन हुए तो दिलों पे ये दो अज़ाब उतरे

सोज़ नजीबाबादी

इंसाँ हवस के रोग का मारा है इन दिनों

सोज़ नजीबाबादी

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