जीवन Poetry (page 49)

तुझ से ऐ ज़िंदगी घबरा ही चले थे हम तो

ग़ुलाम मौला क़लक़

अंदाज़ा आदमी का कहाँ गर न हो शराब

ग़ुलाम मौला क़लक़

वही वा'दा है वही आरज़ू वही अपनी उम्र-ए-तमाम है

ग़ुलाम मौला क़लक़

उठने में दर्द-ए-मुत्तसिल हूँ मैं

ग़ुलाम मौला क़लक़

तुझे कल ही से नहीं बे-कली न कुछ आज ही से रहा क़लक़

ग़ुलाम मौला क़लक़

ऐ सितम-आज़मा जफ़ा कब तक

ग़ुलाम मौला क़लक़

आए क्या तेरा तसव्वुर ध्यान में

ग़ुलाम मौला क़लक़

मैं रिज़्क़-ए-ख़्वाब हो के भी उसी ख़याल में रहा

ग़ुलाम हुसैन साजिद

रुका हूँ किस के वहम में मिरे गुमान में नहीं

ग़ुलाम हुसैन साजिद

मिरी सुब्ह-ए-ख़्वाब के शहर पर यही इक जवाज़ है जब्र का

ग़ुलाम हुसैन साजिद

दास्तान-ए-दर्द-ए-दिल अहल-ए-वफ़ा कहने लगे

ग़ुलाम हुसैन अयाज़

दर्द उल्फ़त का न हो तो ज़िंदगी का क्या मज़ा

ग़ुलाम भीक नैरंग

कट गई बे-मुद्दआ सारी की सारी ज़िंदगी

ग़ुलाम भीक नैरंग

मैं उस के झूट को भी सच समझ के सुनता हूँ

ग़ज़नफ़र

पत्थर

ग़ज़नफ़र

यक़ीन जानिए इस में कोई करामत है

ग़ज़नफ़र

ख़सारे में रहे लेकिन न छोड़ी सादगी हम ने

ग़यास अंजुम

अंदाज़-ए-फ़िक्र अहल-ए-जहाँ का जुदा रहा

ग़नी एजाज़

मिरा उस के पस-ए-दीवार घर होता तो क्या होता

ग़मगीन देहलवी

अल्फ़ाज़-ए-बे-सदा का इम्कान आइने में

ग़ालिब इरफ़ान

था ज़िंदगी में मर्ग का खटका लगा हुआ

ग़ालिब

फिर उसी बेवफ़ा पे मरते हैं

ग़ालिब

दाइम पड़ा हुआ तिरे दर पर नहीं हूँ मैं

ग़ालिब

फिर कुछ इक दिल को बे-क़रारी है

ग़ालिब

मिरी हस्ती फ़ज़ा-ए-हैरत आबाद-ए-तमन्ना है

ग़ालिब

कोह के हों बार-ए-ख़ातिर गर सदा हो जाइए

ग़ालिब

जिस ज़ख़्म की हो सकती हो तदबीर रफ़ू की

ग़ालिब

एक जा हर्फ़-ए-वफ़ा लिखा था सो भी मिट गया

ग़ालिब

धमकी में मर गया जो न बाब-ए-नबर्द था

ग़ालिब

देख कर दर-पर्दा गर्म-ए-दामन-अफ़्शानी मुझे

ग़ालिब

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