निकासी Poetry (page 11)

टूटे जो दाँत मुँह की शबाहत बिगड़ गई

शाद लखनवी

तस्वीर मिरी है अक्स तिरा तू और नहीं मैं और नहीं

शाद लखनवी

ख़लिश-ए-ख़ार हो वहशत में कि ग़म टूट पड़े

शाद लखनवी

जों सब्ज़ा रहे उगते ही पैरों के तले हम

शाद लखनवी

हुई तो जा दिल में उस सनम की नमाज़ में सर झुका झुका कर

शाद लखनवी

दम-ए-आख़िर ये शिकवा क्या न करता

शाद लखनवी

अब्र-ए-दीदा का मिरे हो जो न ओझढ़ पानी

शाद लखनवी

हम तो गवाह हैं कि ग़लत था लिखा गया

शबनम शकील

मैं ने किस शौक़ से इक उम्र ग़ज़ल-ख़्वानी की

शबनम रूमानी

सहरा की बे-आब ज़मीं पर एक चमन तय्यार किया

शायर लखनवी

जो भी अपनों से उलझता है वो कर क्या लेगा

शाद आरफ़ी

निकहत जो तिरी ज़ुल्फ़-ए-मोअ'म्बर से उड़ी है

सय्यद जहीरुद्दीन ज़हीर

तमाम उम्र जिसे आब-ए-तल्ख़ से सींचा

सय्यद सफ़ी हसन

सरों पे धूप तो आँखों में ख़्वाब पत्थर के

सय्यद सफ़ी हसन

मिला न खेत से उस को भी आब-ओ-दाना क्या

सौरभ शेखर

मेरी तुझ से क्या टक्कर है

सौरभ शेखर

यूँ देख मिरे दीदा-ए-पुर-आब की गर्दिश

मोहम्मद रफ़ी सौदा

किस के हैं ज़ेर-ए-ज़मीं दीदा-ए-नम-नाक हनूज़

मोहम्मद रफ़ी सौदा

जिस दम वो सनम सवार होवे

मोहम्मद रफ़ी सौदा

हिन्दू हैं बुत-परस्त मुसलमाँ ख़ुदा-परस्त

मोहम्मद रफ़ी सौदा

देखे बुलबुल जो यार की सूरत

मोहम्मद रफ़ी सौदा

चेहरे पे न ये नक़ाब देखा

मोहम्मद रफ़ी सौदा

आँखों में एक ख़्वाब पस-ए-ख़्वाब और है

सऊद उस्मानी

शिकोह-ए-आब में गुम थे जिहत-निशाँ मेरे

सत्तार सय्यद

ऐ ख़्वाब-ए-दिल-नवाज़ न आ कर सता मुझे

सरवर नेपाली

क्या तमाशा देखिए तहसील-ए-ला-हासिल में है

सरवर आलम राज़

मुंहदिम होती हुई आबादियों में फ़ुर्सत-ए-यक-ख़्वाब होते

सरवत हुसैन

हवा ओ अब्र को आसूदा-ए-मफ़्हूम कर देखूँ

सरवत हुसैन

लगा मजनूँ को ज़हर-ए-इश्क़ क्या आब-ए-बक़ा हो कर

सरताज आलम आबिदी

हैं वही इंसाँ उठाते रंज जो होते ही कज

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

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