अश्क Poetry (page 9)

हुजूम-ए-दर्द मिला ज़िंदगी अज़ाब हुई

शहरयार

अजीब ख़ौफ़ है जज़्बों की बे-लिबासी का

शहनाज़ नबी

मिसरे के वस्त में खड़ा हूँ

शहनवाज़ ज़ैदी

ठहरा है क़रीब-ए-जान आ कर

शाहिदा हसन

एहसास तो मुझी पे कर रही है

शाहिदा हसन

भर गए ज़ख़्म तो क्या दर्द तो अब भी कोई है

शाहिद कमाल

फूलों से सज गई कहीं सब्ज़ा पहन लिया

शाहिद जमाल

मेरे दिल में घर भी बनाता रहता है

शाहिद ग़ाज़ी

मोहब्बत मुझ से कहती थी ज़रा होश्यार दामन से

शाहिद भोपाली

दयार-ए-शाम न बुर्ज-ए-सहर में रौशन हूँ

शहबाज़ नदीम ज़ियाई

ज़िंदगी शब के जज़ीरों से उधर ढूँडते हैं

शहबाज़ ख़्वाजा

वफ़ा का शौक़ ये किस इंतिहा में ले आया

शहबाज़ ख़्वाजा

तिश्नगी ख़ाक बुझे अश्क की तुग़्यानी से

शाह नसीर

न क्यूँ कि अश्क-ए-मुसलसल हो रहनुमा दिल का

शाह नसीर

गले में तू ने वहाँ मोतियों का पहना हार

शाह नसीर

अब्र-ए-नैसाँ की भी झड़ जाएगी पल में शेख़ी

शाह नसीर

ज़ुल्फ़ का क्या उस की चटका लग गया

शाह नसीर

उधर अब्र ले चश्म-ए-नम को चला

शाह नसीर

तू ज़िद से शब-ए-वस्ल न आया तो हुआ क्या

शाह नसीर

सरज़मीन-ए-ज़ुल्फ़ में क्या दिल ठिकाने लग गया

शाह नसीर

सदा है इस आह-ओ-चश्म-ए-तर से फ़लक पे बिजली ज़मीं पे बाराँ

शाह नसीर

रंग मैला न हुआ जामा-ए-उर्यानी का

शाह नसीर

न ज़िक्र-ए-आश्ना ने क़िस्सा-ए-बेगाना रखते हैं

शाह नसीर

न क्यूँ कि अश्क-ए-मुसलसल हो रहनुमा दिल का

शाह नसीर

मिल बैठने ये दे है फ़लक एक दम कहाँ

शाह नसीर

मेरी तुर्बत पर चढ़ाने ढूँडता है किस के फूल

शाह नसीर

मैं ज़ोफ़ से जूँ नक़्श-ए-क़दम उठ नहीं सकता

शाह नसीर

क्यूँ न कहें बशर को हम आतिश-ओ-आब ओ ख़ाक-ओ-बाद

शाह नसीर

जब तलक चर्ब न जूँ शम्-ए-ज़बाँ कीजिएगा

शाह नसीर

हुआ अश्क-ए-गुलगूँ बहार-ए-गरेबाँ

शाह नसीर

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