बदन Poetry (page 33)

महसूस हो रहा है जो ग़म मेरी ज़ात का

बदीउज़्ज़माँ ख़ावर

तुम हँसते क्यूँ हो

अज़रा अब्बास

वतन

अज़मतुल्लाह ख़ाँ

मुराजअत

अज़ीज़ तमन्नाई

मुजस्समा

अज़ीज़ तमन्नाई

कावाक

अज़ीज़ क़ैसी

चोर-बाज़ार

अज़ीज़ क़ैसी

आईने से

अज़ीज़ क़ैसी

उलझाओ का मज़ा भी तिरी बात ही में था

अज़ीज़ क़ैसी

चाँद तारे इक दिया और रात का कोमल बदन

अज़ीज़ नबील

वक़्त की आँख में सदियों की थकन है, मैं हूँ

अज़ीज़ नबील

उस की सोचें और उस की गुफ़्तुगू मेरी तरह

अज़ीज़ नबील

मैं नींद के ऐवान में हैरान था कल शब

अज़ीज़ नबील

ख़याल आता है अक्सर उतार फेंकूँ बदन

अज़ीम हैदर सय्यद

ज़मीं की ख़ाक तो अफ़्लाक से ज़ियादा है

अज़ीम हैदर सय्यद

है अब भी बिस्तर-ए-जाँ पर तिरे बदन की शिकन

अज़हर इक़बाल

घुटन सी होने लगी उस के पास जाते हुए

अज़हर इक़बाल

अटूट अंग

अज़हर गौरी

किसी बदन की सयाहत निढाल करती है

अज़हर फ़राग़

भँवर से ये जो मुझे बादबान खींचता है

अज़हर फ़राग़

भँवर से ये जो मुझे बादबान खींचता है

अज़हर फ़राग़

वो शब के साए में फ़स्ल-ए-नशात काटते हैं

अज़हर अदीब

दर टूटने लगे कभी दीवार गिर पड़े

अज़हर अदीब

नीम-शब आतिश-ए-फ़रियाद-ए-असीराँ रौशन

अज़ीम मुर्तज़ा

फ़ुग़ाँ से तर्क-ए-फ़ुग़ाँ तक हज़ार तिश्ना-लबी है

अज़ीम मुर्तज़ा

साहिल पे रुक के सू-ए-समुंदर न देखिए

आज़ाद गुलाटी

सोचों में लहू उछालते हैं

अय्यूब ख़ावर

लहरों में बदन उछालते हैं

अय्यूब ख़ावर

आ जाए न रात कश्तियों में

अय्यूब ख़ावर

कुछ बदन की ज़बान कहती थी

अतीक़ुल्लाह

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