बदन Poetry (page 34)

क़ल्ब-गह में ज़रा ज़रा सा कुछ

अतीक़ुल्लाह

कुछ और दिन अभी इस जा क़याम करना था

अतीक़ुल्लाह

ख़्वाबों की किर्चियाँ मिरी मुट्ठी में भर न जाए

अतीक़ुल्लाह

कौन गुज़रा था मेहराब-ए-जाँ से अभी ख़ामुशी शोर भरता हुआ

अतीक़ुल्लाह

गरचे मैं सर से पैर तलक नोक-ए-संग था

अतीक़ुल्लाह

अंधेरा मेरे बातिन में पड़ा था

अतीक़ुल्लाह

दुनिया से हुए बैठे हो रू-पोश ऐ जाना

आतिफ़ ख़ान

बनाना पड़ता है अपने बदन को छत अपनी

अतहर नासिक

सफ़र भी जब्र है नाचार करना पड़ता है

अतहर नासिक

इक आग ग़म-ए-तन्हाई की जो सारे बदन में फैल गई

अतहर नफ़ीस

वो इश्क़ जो हम से रूठ गया अब उस का हाल बताएँ क्या

अतहर नफ़ीस

सोचते और जागते साँसों का इक दरिया हूँ मैं

अतहर नफ़ीस

तुम और मैं

अतीया दाऊद

क़रीब से न गुज़र इंतिज़ार बाक़ी रख

अतीक़ असर

मैं ज़ख़्म ज़ख़्म रहूँ रूह के ख़राबों से

अता शाद

दिलों के दर्द जगा ख़्वाहिशों के ख़्वाब सजा

अता शाद

ज़लज़ले का ख़ौफ़ तारी है दर-ओ-दीवार पर

असलम कोलसरी

क़रीब आ के भी इक शख़्स हो सका न मिरा

असलम कोलसरी

सामने शाह-ए-वक़्त के 'असलम' कौन कहे ये बात

असलम हनीफ़

किसी की याद का साया था या कि झोंका था

असलम हबीब

ख़ुद अपनी चाल से ना-आश्ना रहे है कोई

असलम इमादी

बस एक बार उसे रौशनी में देखा था

असलम आज़ाद

मुझे तो ये भी फ़रेब-ए-हवास लगता है

असलम अंसारी

गुबार-ए-एहसास-ए-पेश-ओ-पस की अगर ये बारीक तह हटाएँ

असलम अंसारी

हर तरफ़ हद्द-ए-नज़र तक सिलसिला पानी का है

आसिम वास्ती

इस अदा से मुझे सलाम किया

आसिफ़ुद्दौला

सदियों से अजनबी

अासिफ़ शफ़ी

दूर की शहज़ादी

आसिफ़ रज़ा

इक दिन ख़ुद को अपने अंदर फेंकूँगा

अासिफ़ अंजुम

भूल कर तू सारे ग़म अपने चमन में रक़्स कर

अासिफ़ अंजुम

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