दीपक Poetry (page 13)

दुनिया ने सच को झूट कहा कुछ नहीं हुआ

सय्यद सफ़ी हसन

इक चराग़-ए-दिल फ़क़त रौशन अगर मेरा भी है

सौरभ शेखर

मगर वो दीद को आया था बाग़ में गुल के

मोहम्मद रफ़ी सौदा

हर संग में शरार है तेरे ज़ुहूर का

मोहम्मद रफ़ी सौदा

हर रोज़ इम्तिहाँ से गुज़ारा तो मैं गया

सऊद उस्मानी

एक किताब सिरहाने रख दी एक चराग़ सितारा किया

सऊद उस्मानी

शहर-ए-दिल सुलगा तो आहों का धुआँ छाने लगा

सत्य नन्द जावा

कहाँ कहाँ से निगह उस को ढूँड लाए है

सत्य नन्द जावा

वो चराग़ सा कफ़-ए-रहगुज़ार में कौन था

सत्तार सय्यद

शहज़ादी तुझे कौन बताए तेरे चराग़-कदे तक

सरवत हुसैन

मैं सो रहा था और मिरी ख़्वाब-गाह में

सरवत हुसैन

ये होंट तिरे रेशम ऐसे

सरवत हुसैन

मैं जो गुज़रा सलाम करने लगा

सरवत हुसैन

फ़ुरात-ए-फ़ासिला से दजला-ए-दुआ से उधर

सरवत हुसैन

इक रोज़ मैं भी बाग़-ए-अदन को निकल गया

सरवत हुसैन

आँखों में सौग़ात समेटे अपने घर आते हैं

सरवत हुसैन

आए हैं रंग बहाली पर

सरवत हुसैन

किस शख़्स की तलाश में सर फोड़ती रही

सरमद सहबाई

बुझे चराग़ जलाने में देर लगती है

सरदार सोज़

शायद मिट्टी मुझे फिर पुकारे

सारा शगुफ़्ता

ख़ाली आँखों का मकान

सारा शगुफ़्ता

चराग़ जब मेरा कमरा नापता है

सारा शगुफ़्ता

चाँद का क़र्ज़

सारा शगुफ़्ता

यूँ अकेला दश्त-ए-ग़ुर्बत में दिल-ए-नाकाम था

साक़िब लखनवी

नए चराग़ जला याद के ख़राबे में

साक़ी फ़ारुक़ी

ये ज़ुल्म है ख़याल से ओझल न कर उसे

साक़ी फ़ारुक़ी

तुझे ख़बर है तुझे याद क्यूँ नहीं करते

साक़ी फ़ारुक़ी

बदन चुराते हुए रूह में समाया कर

साक़ी फ़ारुक़ी

करनी नहीं है दुनिया में इक दुश्मनी मुझे

संजीव आर्या

अमीर-ए-शहर के आँगन में जब उजाले हुए

संजय मिश्रा शौक़

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