दर Poetry (page 12)

लम्हा लम्हा शोर सा बरपा हुआ अच्छा लगा

विशाल खुल्लर

दीवार-ओ-दर सा चाहिए दीवार-ओ-दर मुझे

विशाल खुल्लर

इस ख़राबी की कोई हद है कि मेरे घर से

विपुल कुमार

हर मुलाक़ात पे सीने से लगाने वाले

विपुल कुमार

बला का हब्स था पर नींद टूटती ही न थी

विकास शर्मा राज़

असर है ये हमारी दस्तकों का

विकास शर्मा राज़

उसे छुआ ही नहीं जो मिरी किताब में था

विकास शर्मा राज़

कोई उस के बराबर हो गया है

विकास शर्मा राज़

बारिश में अक्सर ऐसा हो जाता है

विकास शर्मा राज़

फैला न यूँ ख़ुलूस की चादर मिरे लिए

वली मदनी

दिल प्यार के रिश्तों से मुकर भी नहीं जाता

वली मदनी

वही हादसों के क़िस्से वही मौत की कहानी

वफ़ा बराही

आसमाँ से सहीफ़े उतरते रहे

उषा भदोरिया

वो ख़्वाब ही सही पेश-ए-नज़र तो अब भी है

उम्मीद फ़ाज़ली

तुम हो जो कुछ कहाँ छुपाओगे

उम्मीद फ़ाज़ली

तुम हो जो कुछ कहाँ छुपाओगे

उम्मीद फ़ाज़ली

इक ऐसा मरहला-ए-रह-गुज़र भी आता है

उम्मीद फ़ाज़ली

उट्ठे जो तेरे दर से तो दुनिया सिमट गई

उमर फ़ारूक़

उस इक दिए से हुए किस क़दर दिए रौशन

उमर अंसारी

हर इक का दर्द उसी आशुफ़्ता-सर में तन्हा था

उमर अंसारी

कभी इक़रार होना था कभी इंकार होना था

उमैर मंज़र

इल्म ओ फ़न के राज़-ए-सर-बस्ता को वा करता हुआ

उमैर मंज़र

बसंत और होली की बहार

उफ़ुक़ लखनवी

कोई वादा न देंगे दान में क्या

तुफ़ैल चतुर्वेदी

फूल होंटों को ग़ज़ल-ख़्वाँ देखना

तुफ़ैल बिस्मिल

अश्क-दर-अश्क वही लोग रवाँ मिलते हैं

त्रिपुरारि

दिन में सूरज है मिरी महरूमियों का तर्जुमाँ

तिश्ना बरेलवी

नूर-जहाँ का मज़ार

तिलोकचंद महरूम

वो दिल कहाँ है अहल-ए-नज़र दिल कहें जिसे

तिलोकचंद महरूम

क्या सुनाएँ किसी को हाल अपना

तिलोकचंद महरूम

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