दर Poetry (page 94)

हो गए मुज़्तर देखते ही वो हिलती ज़ुल्फ़ें फिरती नज़र हम

अहमद हुसैन माइल

लम्हा लम्हा कह रही हैं कुछ फ़ज़ाएँ आग की

अहमद हमदानी

दिलों को रंज ये कैसा है ये ख़ुशी क्या है

अहमद हमदानी

ये अब जो आग बना शहर शहर फैला है

अहमद फ़राज़

उजाड़ घर में ये ख़ुशबू कहाँ से आई है

अहमद फ़राज़

दिल को तिरी चाहत पे भरोसा भी बहुत है

अहमद फ़राज़

तसलसुल

अहमद फ़राज़

सरहदें

अहमद फ़राज़

मत क़त्ल करो आवाज़ों को

अहमद फ़राज़

ख़्वाबों के ब्योपारी

अहमद फ़राज़

कर गए कूच कहाँ

अहमद फ़राज़

भली सी एक शक्ल थी

अहमद फ़राज़

ऐ मेरे वतन के ख़ुश-नवाओ

अहमद फ़राज़

ऐ मेरे सारे लोगो

अहमद फ़राज़

अभी हम ख़ूबसूरत हैं

अहमद फ़राज़

यूँही मर मर के जिएँ वक़्त गुज़ारे जाएँ

अहमद फ़राज़

ये मैं भी क्या हूँ उसे भूल कर उसी का रहा

अहमद फ़राज़

उस मंज़र-ए-सादा में कई जाल बंधे थे

अहमद फ़राज़

उस का अपना ही करिश्मा है फ़ुसूँ है यूँ है

अहमद फ़राज़

सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं

अहमद फ़राज़

सू-ए-फ़लक न जानिब-ए-महताब देखना

अहमद फ़राज़

सभी कहें मिरे ग़म-ख़्वार के अलावा भी

अहमद फ़राज़

क़ुर्ब-ए-जानाँ का न मय-ख़ाने का मौसम आया

अहमद फ़राज़

क़ुर्बत भी नहीं दिल से उतर भी नहीं जाता

अहमद फ़राज़

नौहागरों में दीदा-ए-तर भी उसी का था

अहमद फ़राज़

न मंज़िलों को न हम रहगुज़र को देखते हैं

अहमद फ़राज़

न हरीफ़-ए-जाँ न शरीक-ए-ग़म शब-ए-इंतिज़ार कोई तो हो

अहमद फ़राज़

कल हम ने बज़्म-ए-यार में क्या क्या शराब पी

अहमद फ़राज़

इस क़दर मुसलसल थीं शिद्दतें जुदाई की

अहमद फ़राज़

हवा के ज़ोर से पिंदार-ए-बाम-ओ-दर भी गया

अहमद फ़राज़

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