दर Poetry (page 96)

अब तो हर एक अदाकार से डर लगता है

अफ़ज़ल इलाहाबादी

कभी न ख़ुद को बद-अंदेश-ए-दश्त-ओ-दर रक्खा

अफ़ज़ाल अहमद सय्यद

इक शाम ये सफ़्फ़ाक ओ बद-अंदेश जला दे

अफ़ज़ाल अहमद सय्यद

दीवारों में दर होता तो अच्छा था

अफ़ज़ाल फ़िरदौस

दीवारों में दर होता तो अच्छा था

अफ़ज़ाल फ़िरदौस

यादें

आफ़ताब शम्सी

ख़्वाब के आगे शिकस्त-ए-ख़्वाब का था सामना

आफ़ताब इक़बाल शमीम

दीवार-ए-चीन

आफ़ताब इक़बाल शमीम

वैसे तो बहुत धोया गया घर का अंधेरा

आफ़ताब इक़बाल शमीम

फिर बपा शहर में अफ़रातफ़री कर जाए

आफ़ताब इक़बाल शमीम

हर किसी का हर किसी से राब्ता टूटा हुआ

आफ़ताब इक़बाल शमीम

फ़सील-ए-शहर-ए-तमन्ना में दर बनाते हुए

आफ़ताब हुसैन

पछता रहे हैं दर्द के रिश्तों को तोड़ कर

आफ़ताब आरिफ़

मुझ को मंज़र के सिले में वो सदा भेजता है

आफ़ताब अहमद शाह

ये रेग-ए-रवाँ याद-दहानी तो नहीं क्या

आफ़ताब अहमद

खुली आँखों में दर आने से पहले

आफ़ताब अहमद

जिन को हर हालत में ख़ुश और शादमाँ पाता हूँ मैं

अफ़सर मेरठी

दवाम

अफ़रोज़ आलम

ठोकर से फ़क़ीरों की दुनिया का बिखर जाना

अफ़रोज़ आलम

मौज-दर-मौज हवाओं से बचा लाऊँगा

अफ़रोज़ आलम

गुज़रे लम्हात का एहसास हुआ जाता है

अफ़रोज़ आलम

अंदाज़-ए-नुमू कैसा अलमनाक निकाला

अफ़ीफ़ सिराज

वो मर गई थी

आदिल मंसूरी

लहू को सुर्ख़ गुलाबों में बंद रहने दो

आदिल मंसूरी

ज़मीं छोड़ कर मैं किधर जाऊँगा

आदिल मंसूरी

वो बरसात की शब वो पिछ्ला पहर

आदिल मंसूरी

एक क़तरा अश्क का छलका तो दरिया कर दिया

आदिल मंसूरी

चेहरे पे चमचमाती हुई धूप मर गई

आदिल मंसूरी

अब टूटने ही वाला है तन्हाई का हिसार

आदिल मंसूरी

नहीं कोई ख़बर करना नहीं है

आदिल हयात

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