धूप Poetry (page 27)
गिरे क़तरों में पत्थर पर सदा ऐसा भी होता है
अज़रा वहीद
फ़ज़ा का रंग निखरता दिखाई देता है
अज़रा वहीद
टूटी हुई रस्सी
अज़रा अब्बास
दरीदा-पैरहनों में शुमार हम भी हैं
अज़्म शाकरी
ख़राबी
अज़्म बहज़ाद
कुछ देर तो दुनिया मिरे पहलू में खड़ी थी
अज़ीज़ नबील
मैं उस की धूप हूँ जो मेरा आफ़्ताब नहीं
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
रूठ जाएगा तो मुझ से और क्या ले जाएगा
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
मिरे मिज़ाज को सूरज से जोड़ता क्यूँ है
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
मैं उस की बात के लहजे का ए'तिबार करूँ
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
लहू से उठ के घटाओं के दिल बरसते हैं
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
हटा के मेज़ से इक रोज़ आईना मैं ने
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
ख़ाक ओ ख़ला का हिसार और मैं
अज़ीज अहमद ख़ाँ शफ़क़
ज़मीं की ख़ाक तो अफ़्लाक से ज़ियादा है
अज़ीम हैदर सय्यद
सर पर मिरे उम्र-भर रही धूप
अज़हर सईद
एक इक साँस में सदियों का सफ़र काटते हैं
अज़हर नक़वी
दिल कुछ देर मचलता है फिर यादों में यूँ खो जाता है
अज़हर नक़वी
दर-पेश नहीं नक़्ल-ए-मकानी कई दिन से
अज़हर नक़वी
शुरू-ए-इश्क़ में लोगों ने इतनी शिद्दत की
अज़हर इनायती
ख़त उस के अपने हाथ का आता नहीं कोई
अज़हर इनायती
चलते चलते साल कितने हो गए
अज़हर इनायती
डरे हुए हैं सभी लोग अब्र छाने से
अज़हर फ़राग़
अपने वीराने का नुक़सान नहीं चाहता मैं
अज़हर अब्बास
सफ़र में फ़ासलों के साथ बादबान खो दिया
अय्यूब ख़ावर
आँख की दहलीज़ से उतरा तो सहरा हो गया
अय्यूब ख़ावर
किसी दरख़्त से सीखो सलीक़ा जीने का
अतुल अजनबी
ग़म के बादल दिल-ए-नाशाद पे ऐसे छाए
अतहर राज़
चुप-चाप हब्स-ए-वक़्त के पिंजरे में मर गया
अतहर नासिक
अगर यक़ीन न रखते गुमान तो रखते
अतहर नासिक
ये धूप तो हर रुख़ से परेशाँ करेगी
अतहर नफ़ीस
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